कलेक्टर पर फर्जी मुकदमों के गंभीर आरोप,शिकायतकर्ता का ऐलान—‘मौत मंजूर है, गुलामी नहीं’

रीवा :  शिकायतों पर कार्रवाई नहीं, शिकायतकर्ता पर कार्रवाई क्यों? 13 जून के कथित आदेश से 1 अगस्त की व्हाट्सऐप कॉपी तक उठे कई गंभीर सवाल। मऊगंज में भ्रष्टाचार, कथित माफिया गतिविधियों और अपराध के खिलाफ आवाज उठाने को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अगस्त क्रांति मंच के संयोजक कुंज बिहारी तिवारी ने जिला प्रशासन, खासतौर पर मऊगंज कलेक्टर पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि भ्रष्टाचार और कथित माफिया गिरोहों के खिलाफ आवाज उठाने की सजा उन्हें फर्जी मुकदमों और कार्रवाई के रूप में दी जा रही है।

कुंजबिहारी तिवारी के आरोपों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधे तौर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जो व्यक्ति भ्रष्टाचार की शिकायत कर रहा है,उसकी शिकायत की जांच होगी या उसी पर मुकदमा दर्ज होगा?

‘अपराध करना अपराध नहीं, विरोध करना अपराध!’

अगस्त क्रांति मंच के संयोजक कुंज बिहारी तिवारी ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि मऊगंज में हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना ही सबसे बड़ा अपराध बन गया है।

उनका आरोप है—

“मऊगंज में अपराध करना अपराध नहीं, अपराध का विरोध करना अपराध है। भ्रष्टाचार करना अपराध नहीं, भ्रष्टाचारियों और माफिया गिरोह का विरोध करना अपराध है।”

यह बयान अब महज आरोप नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर उठाया गया सीधा सवाल बन गया है।

शिकायतकर्ता का सवाल—मेरी शिकायतों का क्या हुआ?

उनका कहना है कि उन्होंने भ्रष्टाचार, कथित माफिया गतिविधियों और जनहित से जुड़े कई मामलों को लेकर लगातार शिकायतें और आवेदन दिए। लेकिन उनका आरोप है कि उन शिकायतों पर कार्रवाई करने के बजाय उनके खिलाफ ही कार्रवाई की जा रही है।

अब सवाल सीधा है—

अगर शिकायतें झूठी थीं तो जांच कराकर खारिज क्यों नहीं की गईं?
अगर शिकायतों में दम था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और अगर शिकायतकर्ता गलत था तो उसकी शिकायतों की जांच के बजाय उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों?

इन सवालों का जवाब प्रशासन को देना होगा।

13 जून को आदेश तैयार होने का दावा, 1 अगस्त को व्हाट्सऐप पर मिला—कहीं कहानी में कोई और खेल तो नहीं?

मामले का सबसे गंभीर पहलू शिकायतकर्ता द्वारा किया गया वह दावा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई से संबंधित आदेश कथित तौर पर 13 जून 2026 को ही तैयार कर लिया गया था।
लेकिन शिकायतकर्ता के मुताबिक इसकी प्रति उन्हें 1 अगस्त 2026 को मऊगंज थाने के माध्यम से व्हाट्सऐप पर प्राप्त हुई।

अगर यह दावा सही है तो सवाल बेहद गंभीर हैं—

13 जून को आदेश तैयार हुआ तो 1 अगस्त तक क्यों रोका गया?
आदेश की प्रति तत्काल उपलब्ध क्यों नहीं कराई गई? आदेश तैयार करने की प्रक्रिया क्या थी?
क्या आदेश की तारीख और जारी/प्रेषण की तारीख के रिकॉर्ड की जांच होगी?

इन सवालों के जवाब सामने आए बिना पूरा मामला संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल सकता।

‘जनहित की आवाज दबाने की कोशिश’ का आरोप

कुंज बिहारी तिवारी ने आरोप लगाया है कि कार्रवाई का उद्देश्य भ्रष्टाचार, कथित माफिया गतिविधियों और अपराध के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाना है।
उनका कहना है कि किसान, मजदूर, युवा, बेरोजगार और आम जनता के मुद्दे उठाना अपराध नहीं हो सकता।
उन्होंने प्रशासन से पूछा है कि यदि उनकी शिकायतों में कोई तथ्य नहीं था तो उन्हें जांच के बाद खारिज क्यों नहीं किया गया? क्या संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जांच हुई? क्या शिकायतों पर की गई कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाएगा?

प्रशासन के सामने अब अग्निपरीक्षा

मऊगंज में उठे इन आरोपों ने प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। शिकायतकर्ता के आरोप सही हैं या गलत—इसका फैसला जांच से ही होगा। लेकिन आरोपों की जांच से पहले ही शिकायतकर्ता को कटघरे में खड़ा किए जाने का आरोप निश्चित तौर पर गंभीर सवाल पैदा करता है।
अब प्रशासन को सिर्फ सफाई देने के बजाय रिकॉर्ड के साथ जवाब देना चाहिए कि शिकायतकर्ता ने कब-कब शिकायतें कीं, उन पर क्या कार्रवाई हुई, किन अधिकारियों ने जांच की और क्या निष्कर्ष निकला।

‘मौत मंजूर है, गुलामी नहीं’—झुकने से इनकार

तमाम आरोपों और कथित कार्रवाई के बावजूद शिकायतकर्ता ने पीछे हटने से इनकार किया है। उनका कहना है कि जनहित और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता।

उनके शब्दों में—
“जनहित की आवाज को बंद करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन हम चुप नहीं बैठेंगे। मौत मंजूर है, गुलामी नहीं।”

अब सबसे बड़ा सवाल—शिकायतकर्ता पर कार्रवाई या आरोपों की जांच?

मऊगंज में अब असली परीक्षा प्रशासन की है। यदि शिकायतकर्ता के आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाए। यदि शिकायतों में तथ्य हैं तो भ्रष्टाचार और कथित माफिया गतिविधियों पर कार्रवाई हो।

लेकिन सवाल यह है कि—
क्या मऊगंज में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले को न्याय मिलेगा?क्या 13 जून के कथित आदेश की सच्चाई सामने आएगी?क्या 1 अगस्त को व्हाट्सऐप पर प्रति मिलने के दावे की जांच होगी?क्या पुरानी शिकायतों पर हुई कार्रवाई का हिसाब सार्वजनिक होगा?या फिर सवाल पूछने वाले पर ही कार्रवाई का सिलसिला जारी रहेगा?

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है और प्रशासन का पक्ष सामने आना भी आवश्यक है। लेकिन जब आरोप सीधे प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर हों, तो जवाब सिर्फ बयान से नहीं रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।

रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी 

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.