विधायक के विद्यालय दौरे को ‘शासकीय निरीक्षण’ बताने का आधार क्या?

रीवा/मनगवां :  मनगवां विधानसभा क्षेत्र में सरकारी व्यवस्थाओं और अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार मामला विकासखण्ड गंगेव के विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी द्वारा शासकीय हाई स्कूल टिकुरी-37 के प्राचार्य को जारी किए गए पत्र से जुड़ा है। पत्र में मनगवां विधायक एवं स्थानीय सरपंच/जनप्रतिनिधियों के साथ शिष्टाचार एवं सम्मानजनक व्यवहार नहीं किए जाने का उल्लेख करते हुए प्राचार्य को चेतावनी दी गई है।

इस पत्र को लेकर मनगवां विधानसभा युवा कांग्रेस अध्यक्ष प्रकाश तिवारी ने विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। तिवारी का सीधा सवाल है कि यदि विधायक का विद्यालय दौरा जनप्रतिनिधि के रूप में था, तो उसे ‘शासकीय कार्य अथवा संस्था का निरीक्षण’ किस नियम, अधिनियम, शासनादेश अथवा विभागीय आदेश के तहत माना गया?

विधायक का दौरा कब बन गया विभागीय निरीक्षण?

प्रकाश तिवारी ने कहा कि विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र में जनता की समस्याओं को देखने, शिकायतें सुनने और सरकारी संस्थाओं की स्थिति जानने के लिए दौरा कर सकते हैं। लेकिन विभागीय निरीक्षण, जांच और किसी शासकीय कर्मचारी के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की अपनी निर्धारित प्रक्रिया होती है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी ने विधायक के दौरे को ‘संस्था के निरीक्षण’ के रूप में किस वैधानिक आधार पर दर्ज किया?
तिवारी ने मांग की है कि यदि विभाग के पास ऐसा कोई नियम या शासनादेश है तो उसे सार्वजनिक किया जाए, ताकि जनता भी जान सके कि आखिर किस प्रावधान के तहत जनप्रतिनिधि के दौरे को विभागीय निरीक्षण माना गया।

शिकायत मिली तो प्राचार्य का पक्ष क्यों नहीं?

युवा कांग्रेस अध्यक्ष ने पत्र की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि यदि प्राचार्य के खिलाफ शिकायत प्राप्त हुई थी तो क्या—

- प्राचार्य से लिखित जवाब लिया गया?
- उनके पक्ष को विधिवत सुना गया?
- शिकायत की स्वतंत्र रूप से जांच कराई गई?
- मौके के तथ्यों का सत्यापन किया गया?
- कोई जांच प्रतिवेदन तैयार किया गया?
- कार्रवाई से पहले संबंधित अधिकारी ने अपनी अधिकारिता और प्रक्रिया का परीक्षण किया?

इन सवालों के जवाब भी सामने आने चाहिए।

‘लेटरहेड है,कानून से ऊपर होने का लाइसेंस नहीं’

प्रकाश तिवारी ने कहा कि सरकारी लेटरहेड पर पत्र जारी कर देना अपने आप में किसी अधिकारी को कानून से ऊपर नहीं कर देता। अधिकारियों को जितनी शक्ति कानून और विभागीय नियमों से प्राप्त है, उसका प्रयोग उसी सीमा और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए।
उन्होंने मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 3 तथा मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 में निर्धारित अनुशासनात्मक प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि यदि मामला आगे चलकर किसी कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का रूप लेता है तो प्राकृतिक न्याय और निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है।

‘नियम सबके लिए हैं,फिर मनगवां में अलग व्यवस्था क्यों?’

तिवारी ने सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सम्मान के पात्र हैं, लेकिन सम्मान और शासकीय निरीक्षण की वैधानिक शक्ति दो अलग-अलग विषय हैं।
यदि विधायक का दौरा वास्तव में विभागीय निरीक्षण था तो उसका वैधानिक स्रोत सार्वजनिक किया जाए। यदि वह केवल जनप्रतिनिधि के तौर पर क्षेत्रीय भ्रमण था, तो फिर उसे सरकारी पत्र में ‘संस्था का निरीक्षण’ बताए जाने का आधार भी स्पष्ट किया जाए।
उन्होंने कहा कि सवाल किसी व्यक्ति के सम्मान या अपमान का नहीं, बल्कि अधिकारिता, नियम और प्रशासनिक प्रक्रिया का है।

अब BEO से मांगा जा रहा है नियम की किताब से जवाब

मनगवां विधानसभा युवा कांग्रेस अध्यक्ष प्रकाश तिवारी ने मांग की कि विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी स्पष्ट करें कि 5 अगस्त 2026 को जारी पत्र किस नियम, शासनादेश अथवा विभागीय आदेश के आधार पर जारी किया गया। यदि विधायक के निरीक्षण की कोई वैधानिक व्यवस्था है तो उसका दस्तावेज सार्वजनिक किया जाए।

उन्होंने कहा कि “लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि हों या शासकीय अधिकारी—सभी संविधान और कानून के दायरे में हैं। अधिकार जितना है, उतना ही प्रयोग होना चाहिए, न कम और न ज्यादा।”

अब मामला केवल एक पत्र तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि आखिर विधायक का दौरा किस नियम के तहत ‘शासकीय निरीक्षण’ बना और प्राचार्य को चेतावनी जारी करने से पहले विभाग ने कौन-सी प्रक्रिया अपनाई?
इन सवालों का जवाब अब संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों से अपेक्षित है।

रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी 

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