जैन धर्म में मरते समय खाना नहीं!
"मरते समय खाना नहीं!" — यह वाक्य संलेखना की भावना को बहुत गहराई से दर्शाता है। संलेखना जैन धर्म की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक साधना है, जिसमें व्यक्ति जीवन के अंतिम चरण में धीरे-धीरे भोजन और जल का त्याग करता है, ताकि वह शांत और जागरूक अवस्था में मृत्यु को प्राप्त कर सके।
संलेखना क्या है?
संलेखना एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है, "शरीर और वासनाओं का क्षय करना"।
यह जैन धर्म की एक व्रत-साधना है, जो जीवन के अंतिम चरण में की जाती है. जब व्यक्ति को लगता है कि अब शरीर चलने-फिरने, सोचने, साधना करने में समर्थ नहीं रहा तब वो ऐसा करता है.
इसका उद्देश्य:
अहिंसा — मृत्यु को जबरन नहीं लाना, लेकिन जब मृत्यु निकट है, तब उसे शांत चित्त और स्वेच्छा से स्वीकार करना।
अपनी वासनाओं, मोह-माया, शरीर के प्रति आसक्ति को छोड़ना।
आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की ओर अंतिम कदम।
संलेखना की प्रक्रिया:
संयमपूर्वक निर्णय — इसे कभी भी आकस्मिक रूप से नहीं किया जाता। यह एक सोच-समझ कर लिया गया धार्मिक निर्णय होता है, जिसमें गुरु और परिवार की सहमति होती है।
धीरे-धीरे उपवास — व्यक्ति धीरे-धीरे भोजन की मात्रा कम करता है, फिर केवल जल, और अंततः जल भी त्याग देता है।
ध्यान, जप और आत्म-चिंतन में लीन रहना — ताकि अंत समय में आत्मा शांत और निर्मल हो।
बता दें कि ये आत्महत्या नहीं है, क्यूंकि जैन धर्म में आत्महत्या पाप है, लेकिन संलेखना उसका उल्टा है.


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