NEET आंदोलन के बाद नया बवाल...आरक्षण हटाओ अभियान क्यों ट्रेंड कर रहा है?
एक आंदोलन खत्म हुआ...लेकिन क्या उसने एक और कहीं बड़ा आंदोलन पैदा कर दिया? क्या NEET पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुई लड़ाई अब आरक्षण बनाम मेरिट की जंग में बदल रही है? क्या धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर सवालों की जीत था...या फिर इसने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है? और सबसे बड़ा सवाल...क्या सोशल मीडिया अब सरकारें झुकाने के बाद समाज को नए मुद्दों पर बांटने की ताकत भी दिखा रहा है? जाहिर है जंतर-मंतर से बैरिकेड्स हट चुके हैं...लेकिन इंटरनेट पर अब एक नई लड़ाई शुरू हो चुकी है। आखिर क्या है पूरा मामला...क्यों अचानक "आरक्षण हटाओ आंदोलन" सोशल मीडिया पर छा गया...और क्यों इस बहस ने सरकार से लेकर विपक्ष तक की चिंता बढ़ा दी है? देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट...
दिल्ली के जंतर-मंतर से बैरिकेड्स भले ही हटा दिए गए हों, नीट पेपर लीक आंदोलन खत्म हो चुका हो और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो गया हो...लेकिन रुकिए! इस आंदोलन के शांत होते ही एक ऐसा नया राजनीतिक और सामाजिक तूफान उठ खड़ा हुआ है, जो पूरे देश को झकझोर सकता है! जी हां नीट आंदोलन की राख से अब 'आरक्षण-विरोधी संग्राम' की चिंगारी सुलग उठी है! सोशल मीडिया पर अचानक 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' का ऐसा सैलाब आया है जिसने महज छह दिनों में 58 लाख से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ लिया है!
दरअसल, पिछले कुछ ही दिनों में, CJP की तर्ज पर ही सोशल मीडिया पर 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' यानी RHA नाम के एक अभियान की बाढ़ आ गई है। इस इंस्टाग्राम हैंडल ने महज छह दिन पहले अपनी पहली पोस्ट डाली थी और देखते ही देखते इसके 58 लाख से अधिक फॉलोअर्स हो चुके हैं। RHA खुद को एक नागरिक-नेतृत्व वाला गैर-पक्षपाती आंदोलन बता रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस तरह CJP ने डिजिटल कैंपेन चलाकर लाखों युवाओं को जोड़ा...अब लगभग उसी स्टाइल में आरक्षण विरोधी अभियान भी सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। बताया जा रहा है कि कुछ ही दिनों में इस अभियान से जुड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लाखों लोग जुड़ चुके हैं।
इंस्टाग्राम, एक्स और दूसरे प्लेटफॉर्म पर लगातार वीडियो, रील्स और पोस्ट डाले जा रहे हैं। मांग सिर्फ एक है...जातिगत आरक्षण खत्म करो...आर्थिक आधार पर व्यवस्था लागू करो। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नीट आंदोलन के बीच से आरक्षण विरोधी सुर कैसे निकले? दरअसल, मई में नीट पेपर लीक होने के बाद देश भर में हड़कंप मच गया था। जंतर-मंतर पर जब हजारों छात्र जुटे और कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया, उसी दौरान आरक्षण पर बहस शुरू हुई।
आरक्षण-विरोधी पक्ष के लोगों का दावा था कि नीट पेपर लीक के बाद तनाव में आकर आत्महत्या करने वाले ज्यादातर अभ्यर्थी सामान्य वर्ग से थे। उनका तर्क था कि सीमित सीटों, ऊंचे कट-ऑफ और बार-बार होने वाले परीक्षा घोटालों ने सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए प्रतियोगिता को असंभव जैसा बना दिया है। यानी बहस अब पेपर लीक से निकलकर सीधे मेरिट बनाम आरक्षण तक पहुंच चुकी है। इस पूरे विवाद के पीछे एक और वजह भी बताई जा रही है। दरअसल, कुछ महीने पहले UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता बढ़ाने के लिए नए नियम जारी किए थे। इनमें इक्विटी कमेटी, शिकायत निवारण व्यवस्था और जातिगत भेदभाव रोकने जैसे प्रावधान शामिल थे।
आरक्षित वर्गों ने इन नियमों का स्वागत किया। लेकिन सामान्य वर्ग के कई छात्र संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि नियम एकतरफा हैं... और सामान्य वर्ग के छात्रों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देते। विरोध इतना बढ़ा कि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी। यानी आरक्षण को लेकर जो बहस उस समय शुरू हुई थी...वही अब NEET आंदोलन के बाद फिर से तेज हो गई है। वहीं इसी बीच "आरक्षण हटाओ आंदोलन" ने भी खुद को CJP की तरह एक गैर-राजनीतिक नागरिक अभियान बताया है। अभियान की मांगें हैं...
जातिगत आरक्षण समाप्त किया जाए...
आर्थिक आधार को प्राथमिकता दी जाए...
सरकारी फॉर्मों से जाति का कॉलम हटाया जाए...
और "एक राष्ट्र... एक पहचान" की व्यवस्था लागू हो।
हालांकि अभी तक इस अभियान ने किसी बड़े सड़क आंदोलन का ऐलान नहीं किया है। लेकिन जिस तेजी से सोशल मीडिया पर इसका असर बढ़ रहा है...उसने सरकार और राजनीतिक दलों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। क्योंकि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनाव होने हैं...और भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण सबसे अहम माने जाते हैं। ऐसे में आरक्षण का मुद्दा किसी भी चुनाव का सबसे बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है। यही वजह है कि फिलहाल कोई भी बड़ा राजनीतिक दल खुलकर आरक्षण खत्म करने की मांग का समर्थन करता दिखाई नहीं दे रहा।
क्योंकि यह मुद्दा जितना भावनात्मक है...उतना ही राजनीतिक रूप से विस्फोटक भी।
तो कुल मिलाकर...NEET पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब खत्म जरूर हो चुका है...लेकिन उसकी गूंज अब बिल्कुल नए मोड़ पर पहुंच गई है। एक तरफ छात्र बेहतर परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे थे...दूसरी तरफ उसी आंदोलन के बाद सोशल मीडिया पर आरक्षण बनाम मेरिट की बहस ने नई रफ्तार पकड़ ली है। अब सवाल सिर्फ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का नहीं रह गया...सवाल यह है कि क्या देश की शिक्षा व्यवस्था पर शुरू हुई लड़ाई अब सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है? क्या सोशल मीडिया पर चल रहे अभियान भविष्य की राजनीति तय करेंगे? क्या आने वाले चुनावों में आरक्षण सबसे बड़ा मुद्दा बन जाएगा? या फिर यह बहस सिर्फ इंटरनेट तक सीमित रह जाएगी? अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाती है...राजनीतिक दल किस तरफ खड़े होते हैं... और सबसे अहम...देश का युवा किस मुद्दे को अपनी अगली लड़ाई बनाता है।
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