आरक्षण पर सड़क से संसद तक बहस! क्या जाति की जगह आर्थिक आधार बनेगा?

आज की इस खास रिपोर्ट में बात होगी एक ऐसे मुद्दे की, जिस पर देश की सियासत भी गरम है, सड़क भी गरम है और युवाओं के मन में भी सवालों का सैलाब है...आरक्षण! जी हां...वही आरक्षण, जो दशकों से सामाजिक न्याय, बराबरी और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था का हिस्सा रहा है...लेकिन अब इसी आरक्षण को लेकर राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से ऐसी आवाज उठी है, जिसने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है। 21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों लोग और छात्र ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के बैनर तले जुटे...मांग उठी कि आरक्षण का आधार जाति नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति हो...सरकारी मदद, स्कॉलरशिप, फीस में राहत और कोचिंग जैसी सुविधाएं उन लोगों तक पहुंचें जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है। 

लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है...प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अगर किसी परिवार की कई पीढ़ियां आरक्षण का लाभ लेकर बड़े सरकारी पदों तक पहुंच चुकी हैं, तो उसी परिवार की अगली पीढ़ी को लगातार आरक्षण का लाभ क्यों मिलता रहे? इसी के साथ क्रीमी लेयर लागू करने की मांग उठी...यानी जो लोग सामाजिक और आर्थिक तौर पर आगे निकल चुके हैं, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करके इसका फायदा सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाए। लेकिन दूसरी तरफ एक बेहद अहम सवाल भी है कि क्या जाति आधारित आरक्षण को सिर्फ गरीबी के आधार पर बदल देना ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव की समस्या का समाधान होगा? क्या सिर्फ आर्थिक कमजोरी सामाजिक पिछड़ेपन की पूरी तस्वीर बता सकती है? और आखिर संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की जरूरत क्यों महसूस की थी? आज हम इसी पूरे मुद्दे को शुरुआत से समझेंगे...

दरअसल, देश में आरक्षण को लेकर बवाल मचा हुआ है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर भले ही प्रशासन ने रामलीला मैदान में सिर्फ 500 लोगों के जाने की अनुमति दी थी, लेकिन गुस्साए युवा जंतर-मंतर पर ही डट गए। देर शाम पुलिस और RAF के जवानों ने जब जंतर-मंतर खाली कराया, तब तक इस आंदोलन ने देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि वे किसी की मदद के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन व्यवस्था में रिफॉर्म वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। सरकारी मदद, स्कॉलरशिप, कोचिंग और फीस में राहत का आधार जाति नहीं, बल्कि केवल और केवल आर्थिक तंगी होना चाहिए। आंदोलनकारियों का तर्क है कि अगर किसी परिवार की एक पीढ़ी IAS, IPS, SDM, डॉक्टर, प्रोफेसर या बड़े अधिकारी के पद तक पहुंच चुकी है और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो चुकी है, तो क्या उसके बच्चों को भी वही लाभ मिलना चाहिए जो किसी बेहद गरीब और संसाधनहीन परिवार के बच्चे को मिल रहा है? 

यही वजह है कि प्रदर्शनकारी क्रीमी लेयर को लेकर जोर दे रहे हैं। लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है कि भारत में आरक्षण की व्यवस्था अचानक नहीं बनी थी। जी हां कोल्हापुर के शाहू महाराज ने गैर-ब्राह्मण और पिछड़े वर्गों के लिए प्रतिनिधित्व और आरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। बाद में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 में OBC के लिए 27 प्रतिशत केंद्रीय आरक्षण लागू हुआ। इसके बाद 2019 में संविधान के 103वें संशोधन के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। आज केंद्रीय स्तर पर आम तौर पर आरक्षण व्यवस्था में.....

SC के लिए 15 प्रतिशत
ST के लिए 7.5 प्रतिशत
OBC के लिए 27 प्रतिशत
और EWS के लिए 10 प्रतिशत का प्रावधान है।

लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है कि हर राज्य में आरक्षण की व्यवस्था बिल्कुल एक जैसी नहीं है। राज्य की अपनी सूची, केंद्रीय सूची और अलग-अलग कानूनी प्रावधानों के कारण स्थिति बदल सकती है। आपको बता दें इस आंदोलन के बीच सोशल मीडिया पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का एक वीडियो आग की तरह फैला। वीडियो में वो कड़क आवाज में कहते दिखे कि 'किसी माई के लाल ने दूध नहीं पिया जो आरक्षण समाप्त कर दे...

लेकिन आपको बता दें ये वीडियो आज का नहीं बल्कि पुराना है। जी हां पड़ताल में यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि यह वीडियो हालिया जंतर-मंतर आंदोलन का नहीं है! यह वीडियो 5 नवंबर 2024 का है, जब राजनाथ सिंह झारखंड के लोहरदगा में एक चुनावी जनसभा को संबोधित कर रहे थे। विपक्षी बयानों के जवाब में दिया गया यह पुराना चुनावी भाषण आज के जंतर-मंतर प्रदर्शन से जोड़कर फैलाया जा रहा है, जो कि पूरी तरह से भ्रामक है। वहीं अब आते हैं संविधान पर...लोगों के मन में एक सवाल है कि क्या सरकार चाहे तो एक झटके में आरक्षण खत्म कर सकती है? तो आपको बता दें इसका सीधा जवाब है....नहीं। 

दरअसल, आरक्षण के बड़े हिस्से का आधार संवैधानिक प्रावधान हैं। इसलिए केवल सरकार की घोषणा से पूरी व्यवस्था खत्म नहीं हो सकती। बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए संसद में संविधान संशोधन की प्रक्रिया अपनानी होगी। कुछ संशोधनों के लिए विशेष बहुमत के साथ-साथ आधे से अधिक राज्यों की मंजूरी भी जरूरी हो सकती है। और मामला यहीं खत्म नहीं होता। अगर कोई संवैधानिक संशोधन संविधान की मूल संरचना को प्रभावित करता है, तो सुप्रीम कोर्ट उसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है। इसलिए आरक्षण को लेकर कोई भी बड़ा बदलाव संसद, राज्यों और न्यायपालिका तीनों स्तरों पर कानूनी कसौटी से होकर गुजरेगा। यानी आंदोलन में नारा लगाना अलग बात है...और संविधान की व्यवस्था बदलना बिल्कुल अलग बात।

कुल मिलाकर देखा जाए तो जंतर-मंतर से उठी यह आवाज सिर्फ आरक्षण हटाने की मांग नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जो तय करती है कि किसे मदद मिलेगी, किस आधार पर मिलेगी और कितनी पीढ़ियों तक मिलेगी। अब सवाल यह है कि क्या ऐसा सिस्टम बनाया जा सकता है जिसमें ऐतिहासिक रूप से वंचित व्यक्ति का हक भी सुरक्षित रहे... सबसे जरूरतमंद तक लाभ भी पहुंचे... और आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग का युवा भी खुद को व्यवस्था से बाहर महसूस न करे? क्योंकि अगर आरक्षण का मकसद किसी को हमेशा के लिए पीछे रखना नहीं, बल्कि उसे बराबरी की दौड़ में लाना है...फिलहाल सरकार और न्यायपालिका के सामने यह एक ऐसी अग्निपरीक्षा है, जिसका हल आने वाला वक्त ही बताएगा।

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