प्रशासन की क्रूरता न्याय मांग रहे श्रवण बाधित दिव्यांग को जवा BMO ने लिखा 'आदतन शिकायतकर्ता'

रीवा - जवा विकासखंड में 'खाकी' और 'स्वास्थ्य महकमे' के बीच एक ऐसा संदेहास्पद और अमानवीय गठजोड़ उजागर हुआ है,जिसने मप्र शासन के पारदर्शिता दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। अष्टभुजा हॉस्पिटल में हुई अपनी पत्नी व बच्चे की मौत के वैज्ञानिक साक्ष्य (CDR, गूगल लोकेशन, लाइव स्टिंग ऑपरेशन) लेकर दो साल से न्याय के लिए भटक रहे एक श्रवण बाधित दिव्यांग युवक को न्याय देने के बजाय, खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) जवा ने पदीय शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए उसकी शिकायत को 'विलोपित' (फोर्स क्लोज) करने की सिफारिश कर दी है। यही नहीं बीएमओ ने पीड़ित का चरित्र हनन करते हुए उसे शासकीय रिकॉर्ड पर 'आदतन शिकायतकर्ता' करार दे दिया है।

थाना प्रभारी जवा शैलेंद्र सिंह की चालाकी, बीएमओ की शह

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पीड़ित दिव्यांग युवक ने जवा थाना प्रभारी द्वारा विवेचना में की गई घोर लापरवाहियों साक्ष्यों को गायब करने और मुख्य आरोपियों पर  एफआईआर (FIR) दर्ज न करने के खिलाफ सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी गर्दन फंसती देख जवा थाना प्रभारी ने अत्यंत शातिर तरीके से उस विशुद्ध पुलिसिया शिकायत को स्वास्थ्य विभाग (BMO जवा) की ओर स्थानांतरित (Forward) करवा दिया। कानूनन और प्रशासनिक नियमों के तहत,यदि कोई शिकायत तकनीकी रूप से किसी गलत विभाग में पहुंचती है, तो उसे तत्काल मूल विभाग को वापस भेजा जाना अनिवार्य है। खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) के पास पुलिस की कार्यप्रणाली या 'एफआईआर दर्ज करने' की मांग वाली शिकायत पर निर्णय लेने का कोई विधिक अधिकार (Jurisdiction) नहीं था। लेकिन, बीएमओ ने नियमों को ताक पर रखकर उस गंभीर शिकायत को अपने पास ही डंप कर लिया।

दो बार लिखित विरोध के बाद भी खेला 'फोर्स क्लोज' का खेल

पीड़ित दिव्यांग युवक ने शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद सजगता दिखाते हुए खंड चिकित्सा अधिकारी को दो बार लिखित व मौखिक रूप से सचेत किया था कि— "महोदय, यह शिकायत जवा थाना से संबंधित है , थाना प्रभारी द्वारा गलत तरीके से स्वास्थ्य विभाग में भेजा गया है। कृपया इसे वापस थाना जवा या पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को ट्रांसफर कर दें। इसके बावजूद, बीएमओ जवा ने पीड़ित की विधिक मांग को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। उन्होंने बिना किसी जांच के, एकतरफा तरीके से वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह करते हुए इस शिकायत में फर्जी निराकरण दर्ज करते हुए शिकायत को वरिष्ठ अधिकारियों से "विलोपित" (फोर्स क्लोज) करने की सिफारिश डाल दी। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा आम है कि स्वास्थ्य विभाग ने भी पूर्व में अष्टभुजा हॉस्पिटल के अवैध संचालन पर आंखें मूंदकर अपराधियों को भागने का सुरक्षित रास्ता (Safe Passage) दिया था, और अब यह नया फर्जी निराकरण उसी साठगांठ का हिस्सा है।

विधिक सवालों पर काटा फोन,व्हाट्सएप पर भी पसरा मौन

इस प्रशासनिक तानाशाही का सबसे शर्मनाक पहलू तब सामने आया जब पीड़ित दिव्यांग ने बीएमओ से सीधे विधिक आधार पर जवाब मांगा। पीड़ित ने सवाल किया कि— "सर, जो शिकायत पुलिस विभाग से जुड़ी थी,उसे अपने स्तर पर "विलोपित (फोर्सक्लोज) करने की सिफारिश आपने किस कानून के तहत की?" इस सीधे सवाल का सामना करने के बजाय बीएमओ ने प्रार्थी की श्रवण बाधित विवशता का मजाक उड़ाते हुए तत्काल फोन काट दिया और दोबारा फोन उठाना बंद कर दिया।इसके बाद पीड़ित ने संवाद के अंतिम माध्यम के रूप में व्हाट्सएप (WhatsApp) पर लिखित मैसेज भेजकर अपनी शिकायत वापस पुलिस विभाग में भेजने की गुहार लगाई। लेकिन, खबर लिखे जाने तक 24 घंटे से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी बीएमओ ने न तो उस मैसेज का कोई जवाब दिया और न ही शिकायत को वापस जवा थाना भेजा।

गंभीर कानूनी धाराओं के उल्लंघन का मामला

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, खंड चिकित्सा अधिकारी का यह कृत्य केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक संज्ञेय अपराध है। खंड चिकित्सा अधिकारी जवा द्वारा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 92(a) का उल्लंघन किया गया है। इसके अलावा लोक सेवक द्वारा किसी नागरिक को क्षति पहुँचाने की नियत से कानून की अवज्ञा करना तथा वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह करने के लिए 'कूटरचित शासकीय प्रतिवेदन' तैयार करना गंभीर विधिक अपराध है।

कलेक्टर और मानवाधिकार आयोग से हस्तक्षेप की मांग

पीड़ित दिव्यांग ने अब इस पूरे घटनाक्रम, डिजिटल साक्ष्यों और व्हाट्सएप चैट के स्क्रीनशॉट के साथ माननीय जिला कलेक्टर रीवा, पुलिस अधीक्षक (SP) और राज्य मानवाधिकार आयोग को विशेष शिकायत भेजने की तैयारी कर ली है। पीड़ित का कहना है कि जवा बीएमओ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी हैं, उनके पास पुलिस की शिकायत या एफआईआर की मांग वाली फाइल को बंद करने या उस पर फर्जी निराकरण दर्ज करके विलोपित करने की सिफारिश करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। उनका यह कृत्य पूरी तरह 'शून्य और अवैध' है। अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर शिकायत पर फर्जी निराकरण दर्ज करने, शिकायत को विलोपित करने, पीड़ित दिव्यांग को "आदतन शिकायतकर्ता" बताने  वाले खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) को तत्काल प्रभाव से पद से निलंबित किया जाए और इस फर्जी निराकरण को शून्य घोषित कर मूल शिकायत को राजपत्रित पुलिस अधिकारी के पास ट्रांसफर किया जाए।

रिपोर्टर - अर्जुन तिवारी 

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