ग्रामीण विकास की हत्या में फर्जी मेडिकल स्टोर बिलों का खेल — बड़ा सवाल

रेवा - एक समय था जब मेडिकल स्टोर और ड्रग स्टोर को जीवनदायिनी दवाइयों का केंद्र माना जाता था।जहाँ से लोगों को इलाज मिलता था,राहत मिलती थी और जीवन को बचाने वाली दवाइयाँ मिलती थीं। लेकिन समाज ने वह भयावह दौर भी देखा, जब कुछ मेडिकल स्टोर कथित रूप से नशीले सिरप और प्रतिबंधित दवाओं के कारोबार का माध्यम बन गए। कोरेक्स जैसे नशीले सिरप ने हजारों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया। कम उम्र के युवक नशे की गिरफ्त में आकर समय से पहले बूढ़े दिखाई देने लगे, परिवार टूटने लगे और पूरा क्षेत्र बदनामी का शिकार हुआ। रीवा संभाग सहित कई क्षेत्रों में इस गंभीर समस्या पर प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई। तत्कालीन अधिकारियों ने अभियान चलाए और मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने भी इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से सहयोग माँगा। इसके बाद नशे के कारोबार पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित किया गया। लेकिन अब एक और चौंकाने वाली तस्वीर सामने आ रही है।आरोप हैं कि कुछ मेडिकल और ड्रग स्टोर, जो दवाइयाँ बेचने के लिए लाइसेंस प्राप्त हैं, उनके नाम से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के कार्यों में गिट्टी, बालू, मिट्टी, रेत, ईंट, सरिया और अन्य निर्माण सामग्री के बिल लगाए जा रहे हैं।

जनता सवाल पूछ रही है

क्या मेडिकल स्टोर में गिट्टी-बालू बिकती है?क्या दवा दुकानों में सरिया और ईंट रखी जाती है?अगर नहीं, तो फिर पंचायतों के निर्माण कार्यों में ऐसे बिल कैसे लगाए गए? यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं है, बल्कि ग्रामीण विकास की योजनाओं पर सीधा हमला प्रतीत होता है।यह गरीबों के विकास, सड़क, तालाब, पंचायत भवन, जल योजनाओं और रोजगार के लिए आने वाली सरकारी राशि पर डाका है। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की ऑनलाइन व्यवस्था, पीआरडी पोर्टल और रिकॉर्ड में सब कुछ दर्ज होता है, तब भी ऐसी कथित अनियमितताएँ कैसे संभव हो रही हैं? क्या इसके पीछे राजनीतिक संरक्षण है?क्या प्रशासनिक संरक्षण है?क्या प्रभावशाली लोगों का दबाव कार्रवाई रोक रहा है?देशभर में पंचायत और स्वास्थ्य विभागों में फर्जी बिल, भुगतान और भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आ चुके हैं। विभिन्न राज्यों में जांच एजेंसियों ने फर्जी भुगतान, मेडिकल बिल घोटाले और पंचायत निधियों में अनियमितताओं का खुलासा किया है। आज जनता यह जानना चाहती है कि —जो मेडिकल स्टोर कभी युवाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ करने के आरोपों में चर्चा में थे क्या अब वही ग्रामीण विकास योजनाओं में भी फर्जी बिलों के जरिए सरकारी धन के दुरुपयोग का माध्यम बन रहे हैं? संविधान,कानून और लोकतंत्र यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक जनता के टैक्स का पैसा फर्जी बिलों में दफन होता रहेगा?

अब समय आ गया है कि —

ऐसे सभी संदिग्ध बिलों की उच्चस्तरीय जांच हो संबंधित मेडिकल एवं ड्रग स्टोरों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो दोषियों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएँ और जनता के धन की रिकवरी सुनिश्चित की जाए भ्रष्टाचार केवल सरकारी धन की चोरी नहीं होता,बल्कि यह गरीबों के अधिकारों, विकास और भविष्य की हत्या होता है।

रिपोर्टर - अर्जुन तिवारी 

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