श्रवण बाधित दिव्यांग का कलेक्टर रीवा,क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं रीवा संभाग और CMHO को मेल,जवा BMO को सस्पेंड करने और FIR की मांग
रेवा : अष्टभुजा हॉस्पिटल जवा प्रसव कांड में अपनी पत्नी और अजन्मे शिशु को खोने के बाद न्याय की लड़ाई लड़ रहे श्रवण बाधित दिव्यांग पति ने अब रीवा के भ्रष्ट प्रशासनिक सिंडिकेट की ईंट से ईंट बजा दी है। जवा थाना प्रभारी की विधिक लापरवाहियों को उजागर करने के बाद, पीड़ित दिव्यांग ने अब स्वास्थ्य विभाग के खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) जवा के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। प्रार्थी ने जिला कलेक्टर, क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं रीवा संभाग और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) रीवा को एक विस्तृत व आधिकारिक ई मेल से शिकायत भेजकर बीएमओ को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) करने तथा शासकीय रिकॉर्ड/पोर्टल में दिव्यांग को "आदतन शिकायतकर्ता" लिखकर प्रताड़ित व अपमानित करने के विरुद्ध दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत नामजद प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने की मांग की है। इस डिजिटल विधिक प्रहार से स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है।
क्या है ई-मेल में? अधिकार क्षेत्र के उल्लंघन का पूरा कच्चा चिट्ठा
कलेक्टर और सीएमएचओ को भेजे गए मेल में पीड़ित ने साक्ष्यों के साथ बताया कि उसने जवा थाना प्रभारी की गंभीर लापरवाहियों के खिलाफ पुलिस विभाग में शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी गर्दन फंसती देख टीआई ने उस विशुद्ध पुलिसिया शिकायत को स्वास्थ्य विभाग (BMO जवा) की तरफ घुमा दिया। बीएमओ यह भली-भांति जानते थे कि उनके पास पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली या 'एफआईआर दर्ज करने' की मांग वाली फाइल पर निर्णय लेने का कोई विधिक अधिकार (Jurisdiction) नहीं था। इसके बावजूद, पीड़ित द्वारा दो बार लिखित आपत्ति दर्ज कराने के बाद भी बीएमओ ने शिकायत को वापस जवा थाना ट्रांसफर नहीं किया और अपराधियों को 'सेफ एग्जिट' देने के लिए उस पर 'फर्जी निराकरण' दर्ज कर उसे 'फोर्स क्लोज' करने की सिफारिश कर दी।
"आदतन शिकायतकर्ता" शब्द पर विधिक घेराबंदी, ५ साल की जेल का प्रावधान
ई- मेल में सबसे कड़ा आक्षेप बीएमओ की संवेदनहीन और दमनकारी कार्यप्रणाली पर लगाया गया है। दो साल से वैज्ञानिक साक्ष्य (CDR, गूगल लोकेशन,लाइव स्टिंग ऑपरेशन) लेकर भटक रहे एक श्रवण बाधित दिव्यांग को सरकारी प्रतिवेदन/पोर्टल पर "आदतन शिकायतकर्ता" (Habitual Complainant) लिखकर संबोधित करना शासकीय सेवा नियमों का घोर उल्लंघन तो है ही, साथ ही यह एक संज्ञेय अपराध भी है। विधिक जानकारों के मुताबिक, *दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, २०१६ की धारा ९२(a)* के तहत किसी दिव्यांग व्यक्ति को उसकी दिव्यांगता या उसकी न्याय की लड़ाई के कारण शासकीय दस्तावेजों में नीचा दिखाना, अपमानित करना या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना एक गंभीर अपराध है,जिसमें ६ महीने से लेकर ५ वर्ष तक के कठोर कारावास का स्पष्ट प्रावधान है। पीड़ित ने इसी केंद्रीय कानून के तहत बीएमओ पर एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है।
मीडिया की धमक से बैकफुट पर आए बीएमओ, पर विधिक फंदे से बचना मुश्किल
गौरतलब है कि कल जैसे ही बीएमओ जवा की इस तानाशाही और व्हाट्सएप संदेशों को २४ घंटे तक नजरअंदाज करने की खबर मीडिया और न्यूज चैनलों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई, बीएमओ साहब पूरी तरह बैकफुट पर आ गए। कानूनी कार्रवाई और सस्पेंशन के डर से उन्होंने आनन-फानन में अपनी गलती छुपाने के लिए शिकायत को वापस पुलिस थाना जवा भेजने की नई सिफारिश तैयार की है।
परंतु, पीड़ित दिव्यांग ने कलेक्टर को भेजे मेल में स्पष्ट किया है कि मीडिया के डर से अब 'यू-टर्न' (U-turn) लेने मात्र से बीएमओ का मूल विधिक अपराध खत्म नहीं हो जाता। शासकीय पोर्टल पर किया गया फर्जीवाड़ा और दिव्यांग का किया गया चरित्र हनन रिकॉर्ड पर दर्ज है, जिसके लिए उन्हें दंडित होना ही पड़ेगा।
क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं रीवा संभाग और कलेक्टर रीवा के रुख पर टिकी नजरें
इस धमाकेदार ई मेल और अकाट्य डिजिटल साक्ष्यों के सामने आने के बाद अब गेंद रीवा जिला कलेक्टर और क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं रीवा संभाग के पाले में है। पीड़ित ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इस भ्रष्ट अंतर-विभागीय साठगांठ पर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई और दोषी बीएमओ को निलंबित नहीं किया गया, तो वे इस पूरे मामले और शासकीय प्रतिवेदनों को लेकर राज्य मानवाधिकार आयोग और *माननीय उच्च न्यायालय (High Court) में रिट याचिका दायर करेंगे, जिसकी संपूर्ण जवाबदेही जिला प्रशासन की होगी।
रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी
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