302 के मामले में तीन आरोपी दोषमुक्त,कोर्ट में जब्त सामान की पहचान पर उठे गंभीर सवाल

रीवा : अमहिया थाना क्षेत्र में वर्ष 2023 में हुए बहुचर्चित हत्या के मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा तीन आरोपियों को दोषमुक्त किए जाने के बाद पुलिस की विवेचना और जब्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अभियोजन के लिए सबसे बड़ा झटका उस समय सामने आया, जब कोर्ट में पेश किए गए कथित जब्त सामान की पहचान ही सवालों के घेरे में आ गई।

मामला 22 मई 2023 को अर्जुन नगर ग्राउंड में वैभव सिंह की कथित पत्थर से कुचलकर हत्या से जुड़ा है। घटना के बाद अमहिया थाना पुलिस ने राजू सिंह बघेल, अजीत पटेल सहित तीन आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत प्रकरण दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया था।

पुलिस ने जब्ती को बनाया था अहम साक्ष्य,कोर्ट में उठे सवाल

विवेचना के दौरान पुलिस द्वारा घटनास्थल से डंडा, कपड़े और बोलेरो वाहन सहित अन्य सामग्री जब्त किए जाने की बात सामने आई थी। जब्त सामग्री को एफएसएल जांच के लिए भेजा गया, जहां डंडे और कपड़ों पर मानव रक्त पाए जाने की रिपोर्ट का दावा किया गया था।
लेकिन मुकदमे की सुनवाई के दौरान जब यही कथित जब्त सामग्री न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुई तो उसकी पहचान को लेकर गंभीर विसंगति सामने आई। आरोपियों की ओर से यह सवाल उठाया गया कि एफएसएल जांच के लिए भेजी गई सामग्री और कोर्ट में पेश किए गए डंडे व कपड़े एक ही हैं या नहीं। साक्ष्यों की पुष्टि और गवाहों के समर्थन में सामने आई कमियों ने अभियोजन की कहानी को कमजोर कर दिया।

सिर्फ एफएसएल रिपोर्ट काफी नहीं, साक्ष्य की पहचान भी जरूरी

मामले में सबसे गंभीर सवाल यही है कि यदि किसी वस्तु को हत्या के मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में जब्त किया गया है, तो उसकी जब्ती से लेकर एफएसएल जांच और न्यायालय में प्रस्तुति तक उसकी पहचान और कड़ी स्पष्ट होनी चाहिए। कथित तौर पर इसी प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का अभियोजन पक्ष प्रभावी ढंग से निराकरण नहीं कर सका।
नतीजतन जिला एवं सत्र न्यायालय ने अभियोजन के साक्ष्यों और गवाहों की पुष्टि न होने के आधार पर तीनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।

पुलिस विवेचना पर अब उठ रहा बड़ा सवाल

फैसले के बाद सवाल केवल आरोपियों के दोषमुक्त होने तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि हत्या जैसे गंभीर मामले में जब्ती, सीलिंग, एफएसएल जांच और न्यायालय में साक्ष्य पेश करने की प्रक्रिया में ऐसी विसंगतियां कैसे सामने आईं? यदि पुलिस के पास मजबूत वैज्ञानिक साक्ष्य होने का दावा था, तो अदालत में उनकी विश्वसनीयता और पहचान क्यों कायम नहीं रह सकी?
यह मामला अब पुलिस विवेचना की गुणवत्ता और साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया पर गंभीर बहस खड़ी करता है।
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता राजीव सिंह परिहार, सुरेश विश्वकर्मा, अनिल पांडेय, गिरीश पटेल, अमित शुक्ला, प्रवीण एवं प्रतीक ने पैरवी की।

रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी

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