जनहित से बड़ा नेताओं का प्रोटोकॉल? कलेक्टर को पीछे खड़ा करने वाली तस्वीर पर उठे तीखे सवाल
रीवा : रीवा जिले में इन दिनों बारिश और बाढ़ से जनता बेहाल है, राहत और बचाव व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन इसी बीच सामने आई एक तस्वीर ने प्रशासनिक गरिमा और राजनीतिक आवभगत को लेकर नई बहस छेड़ दी है। तस्वीर में जनप्रतिनिधि प्रमुख स्थान पर बैठे दिखाई दे रहे हैं, जबकि जिले के प्रशासनिक मुखिया कलेक्टर पीछे खड़े नजर आ रहे हैं। तस्वीर सामने आते ही सवाल उठ रहा है—क्या जनहित से बड़ा नेताओं का प्रोटोकॉल हो गया है?
जनप्रतिनिधियों का सम्मान लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था होना भी जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सम्मान और आवभगत के नाम पर प्रशासनिक पद की गरिमा को पीछे धकेलना उचित है? कलेक्टर जिले की प्रशासनिक व्यवस्था के प्रमुख होते हैं। कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, विकास कार्यों से लेकर जनता की शिकायतों और संकट के समय राहत-बचाव तक की बड़ी जिम्मेदारी प्रशासन के कंधों पर होती है।
ऐसे में तस्वीर का दृश्य कई सवाल खड़े करता है। यदि नेताओं के बैठने के लिए आगे स्थान सुनिश्चित किया जा सकता है, तो जिले के प्रशासनिक मुखिया के लिए गरिमापूर्ण स्थान क्यों नहीं? क्या राजनीतिक प्रभाव के सामने प्रशासनिक प्रोटोकॉल और पद की गरिमा कमजोर पड़ रही है?
बाढ़ के बीच वीआईपी संस्कृति पर सवाल
रीवा में बारिश और बाढ़ जैसे हालात के बीच आम जनता राहत, बचाव और त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई की उम्मीद कर रही है। कई इलाकों में जलभराव और बाढ़ की स्थिति को लेकर लोग परेशान हैं। ऐसे समय में किसी बैठक की तस्वीर यदि यह संदेश देती दिखाई दे कि जनता की समस्याओं से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनीतिक तामझाम और आवभगत है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनता के बीच चर्चा यह भी है कि प्रशासनिक अधिकारी यदि मैदान में जनता के बीच जवाबदेही निभा रहे हैं, तो बैठकों में भी उनकी भूमिका और पद की गरिमा स्पष्ट दिखाई देनी चाहिए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि महत्वपूर्ण हैं तो प्रशासनिक व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दोनों का सम्मान होना चाहिए, किसी एक को दूसरे के सामने छोटा दिखाना नहीं।
क्या तस्वीर व्यवस्था का आईना है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह महज एक तस्वीर है या व्यवस्था की मानसिकता की झलक? संभव है कि तस्वीर किसी विशेष क्षण की हो और उस समय की परिस्थितियों के कारण कलेक्टर पीछे खड़े दिखाई दिए हों। इसलिए केवल एक तस्वीर के आधार पर किसी अधिकारी या व्यवस्था पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि तस्वीरें कई बार हजार शब्दों से ज्यादा सवाल खड़े कर देती हैं। जब जिले की जनता बाढ़, जलभराव और दूसरी समस्याओं से जूझ रही हो, तब प्रशासनिक गरिमा और प्राथमिकताओं को लेकर उठे सवालों को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।
जनता पूछ रही है सीधा सवाल
राजनीति और प्रशासन लोकतंत्र के दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं। जनप्रतिनिधियों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की संवैधानिक और प्रशासनिक भूमिका की गरिमा भी कायम रहनी चाहिए।
अब सवाल सिर्फ एक तस्वीर का नहीं, बल्कि उस संदेश का है जो ऐसी तस्वीरें जनता तक पहुंचाती हैं—
क्या जनहित सर्वोच्च है या नेताओं की आवभगत?
क्या प्रशासनिक गरिमा राजनीतिक प्रोटोकॉल के आगे पीछे खड़ी रहेगी?
और क्या बाढ़ से जूझती जनता के बीच वीआईपी संस्कृति को लेकर उठ रहे सवालों का कोई जवाब मिलेगा?
जनता को राजनीति का तामझाम नहीं, जवाबदेह प्रशासन और संकट के समय जमीन पर दिखने वाली कार्रवाई चाहिए। लोकतंत्र में सम्मान सभी का हो, लेकिन जनहित और प्रशासनिक गरिमा की कीमत पर नहीं।
रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी
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