आरक्षण पर सवाल संविधान-विरोध नहीं,समान अवसर की संवैधानिक बहस है - पं. सतीश चौबे
रीवा : जातिगत आरक्षण की नीति पर उठे तीखे सवाल,बोले गरीबी और वास्तविक वंचना को भी मिले बराबर महत्व; “सवाल व्यवस्था से है,किसी जाति से नहीं”।
खबर मध्यप्रदेश के रीवा जिले से है जहां आरक्षण व्यवस्था को लेकर देश में जारी बहस अब एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। समान अवसर, योग्यता और वास्तविक वंचना को आधार बनाकर आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग उठाते हुए अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के मध्यप्रदेश प्रदेश सचिव पं. सतीश चौबे ने जातिगत आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के शिक्षा और रोजगार के अवसर का निर्धारण केवल उसकी जातिगत पहचान से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक सामाजिक, शैक्षणिक और अवसरगत स्थिति को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
“आरक्षण पर सवाल उठाना संविधान का विरोध नहीं”
पं. सतीश चौबे ने कहा कि आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाना संविधान-विरोधी रवैया नहीं है, बल्कि संविधान में निहित समानता और समान अवसर की भावना पर गंभीर विमर्श है। उनका कहना है कि गरीब और वंचित परिवार का बच्चा किसी भी जाति से हो सकता है, इसलिए नीति निर्माण में वास्तविक जरूरत और अवसरों की कमी को भी प्रभावी स्थान मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सवाल किसी जाति के अधिकार छीनने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि देश में अवसरों का वितरण किस आधार पर अधिक न्यायपूर्ण बनाया जाए।
1951 के फैसले से शुरू हुई संवैधानिक बहस का हवाला
आरक्षण पर बहस के बीच 1951 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले State of Madras v. Champakam Dorairajan का भी हवाला दिया जा रहा है। इस मामले में मद्रास सरकार द्वारा मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटों के सामुदायिक आधार पर वितरण को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में इसे अनुच्छेद 29(2) के विरुद्ध माना था।
हालांकि, इसके बाद संविधान में संशोधन कर राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए विशेष प्रावधान करने का संवैधानिक आधार दिया गया। ऐसे में आरक्षण का मौजूदा स्वरूप भी संविधान के समानता और सामाजिक न्याय के व्यापक ढांचे के भीतर ही बहस का विषय है।
जाति के साथ वास्तविक वंचना भी बने पैमाना
पं. सतीश चौबे का कहना है कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन नीति निर्माण में आर्थिक स्थिति, शिक्षा तक पहुंच और वास्तविक अवसरगत वंचना जैसे पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल जातिगत पहचान ही किसी व्यक्ति की पूरी सामाजिक और आर्थिक स्थिति तय करने का पर्याप्त आधार हो सकती है? यदि कोई गरीब परिवार शिक्षा, रोजगार और संसाधनों से वंचित है, तो उसकी कठिनाइयों को भी नीति के केंद्र में लाना होगा।
“प्रतिभा को अवसर मिले, वंचित को सहारा मिले”
आरक्षण की समीक्षा की मांग को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें वास्तविक रूप से वंचित व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए प्रभावी सहायता मिले और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को भी अपनी क्षमता के अनुरूप अवसर प्राप्त हों।
उन्होंने कहा कि “गरीबी हो तो सहायता मिले, वंचना हो तो अवसर मिले और प्रतिभा हो तो उसे आगे बढ़ने का रास्ता मिले। सवाल व्यवस्था से है, किसी जाति से नहीं।”
आरक्षण को लेकर यह बहस आने वाले समय में और तीखी होने के आसार हैं। एक ओर सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक वंचना के आधार पर आरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जाति के साथ आर्थिक, शैक्षणिक और वास्तविक अवसरगत वंचना को भी नीति का महत्वपूर्ण आधार बनाने की मांग उठ रही है।
पं. चौबे ने कहा कि इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर गंभीर संवैधानिक और सामाजिक विमर्श की जरूरत है, ताकि समानता, सामाजिक न्याय और समान अवसर—तीनों के बीच संतुलन कायम करने वाली व्यवस्था पर देश में सार्थक बहस हो सके।
रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी
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