हाईकोर्ट से गुढ़ नगर परिषद अध्यक्ष अर्चना सिंह के पति डॉ. कल्याण सिंह को बड़ा झटका
रेवा - तबादले को दंडात्मक कार्रवाई बताने की कोशिश नाकाम,हाईकोर्ट ने खारिज की रिट याचिका प्रशासनिक जरूरत और जनहित में ट्रांसफर को महज शिकायत या जांच की पृष्ठभूमि से ‘सजा’ नहीं माना जा सकता। लोकायुक्त कार्रवाई की पृष्ठभूमि में हुए तबादले को दंडात्मक कार्रवाई बताकर चुनौती देने वाले चिकित्सा अधिकारी डॉ.कल्याण सिंह को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से करारा झटका लगा है। जबलपुर स्थित हाईकोर्ट की एकलपीठ ने उनकी रिट याचिका खारिज करते हुए तबादला आदेश में हस्तक्षेप से साफ इनकार कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद उस दलील पर भी सवाल खड़े हो गए हैं, जिसमें तबादले को कथित रूप से कार्रवाई अथवा प्रताड़ना के रूप में पेश किया जा रहा था।
न्यायमूर्ति मनिंदर एस. भट्टी की एकलपीठ ने 19 नवंबर 2025 को रिट याचिका क्रमांक 44440/2025 में आदेश पारित किया। डॉ. कल्याण सिंह ने 4 नवंबर 2025 के तबादला आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गुरह से सिविल अस्पताल सिरमौर स्थानांतरित किया गया था।
लोकायुक्त कार्रवाई के अगले दिन तबादला, लेकिन कोर्ट में नहीं टिक सकी दलील
मामले की पृष्ठभूमि में 3 नवंबर 2025 को जय प्रकाश गुप्ता की शिकायत पर रायपुर कर्चुलियान स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई लोकायुक्त कार्रवाई का उल्लेख है। रिकॉर्ड के अनुसार कार्रवाई के दौरान शिव शंकर तिवारी से 8 हजार रुपये बरामद किए गए थे। डॉ.कल्याण सिंह की ओर से अदालत में यह दलील रखी गई कि उनके कब्जे से कोई रकम बरामद नहीं हुई और जांच में उनका परिणाम नकारात्मक रहा। इसके बावजूद अगले ही दिन तबादला आदेश जारी कर दिया गया। इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर तबादले को दंडात्मक कार्रवाई बताया गया और न्यायालय से राहत मांगी गई।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। ‘तबादला ही सजा है’ वाली दलील को कोर्ट ने नहीं माना याचिकाकर्ता की ओर से Somesh Tiwari बनाम Union of India के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि तबादला किसी कर्मचारी को दंडित करने के उद्देश्य से किया गया हो तो उसे सामान्य प्रशासनिक आदेश नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर शासन की ओर से सरकारी वकील गिरीश केकरे ने तबादले को प्रशासनिक अधिकार का हिस्सा बताते हुए याचिका खारिज करने की मांग की। हाईकोर्ट ने Union of India बनाम Janardhan Debanath सहित सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि प्रशासनिक आवश्यकता और जनहित में स्थानांतरण के लिए प्रत्येक मामले में पहले विस्तृत विभागीय जांच पूरी होना अनिवार्य नहीं है। यानी केवल यह तथ्य कि किसी अधिकारी से जुड़ी शिकायत, विवाद या जांच की पृष्ठभूमि मौजूद है, अपने आप में तबादले को दंडात्मक आदेश नहीं बना देता।
पुराने प्रशासनिक विवाद ने भी बढ़ाई थी हलचल
रिकॉर्ड में डॉ. कल्याण सिंह से जुड़ा एक पुराना प्रशासनिक विवाद भी सामने आया। वह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गुढ़ में चिकित्सा अधिकारी थे और उन्हें रायपुर कर्चुलियान के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर का प्रभार भी दिया गया था।
23 मई 2025 के आदेश से यह प्रभार डॉ. विवेक कुमार पटेल को सौंपने का प्रयास किया गया था। डॉ. सिंह ने इस आदेश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 5 जून 2025 को समन्वय पीठ ने नोटिस जारी करते हुए उक्त आदेश के संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी थी।याचिकाकर्ता ने बाद के घटनाक्रम को लोकायुक्त प्रकरण और तबादले से जोड़ते हुए अपने पक्ष में आधार बनाया, लेकिन वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने तबादले को दंडात्मक अथवा कलंकित करने वाला आदेश मानने से इनकार कर दिया।
अब सवाल—जब याचिका खारिज हो चुकी थी तो पूरी तस्वीर सामने क्यों नहीं?
इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल न्यायिक रिकॉर्ड और सार्वजनिक दावों के बीच पारदर्शिता को लेकर उठ रहा है। यदि हाईकोर्ट ने तबादले को चुनौती देने वाली डॉ. कल्याण सिंह की याचिका खारिज कर दी थी,तो इस महत्वपूर्ण न्यायिक तथ्य को सार्वजनिक चर्चा में स्पष्ट रूप से सामने रखना क्यों जरूरी नहीं समझा गया? लोकायुक्त कार्रवाई,उसके अगले दिन तबादला और फिर हाईकोर्ट में चुनौती—इन तीनों घटनाक्रमों को अलग-अलग देखने के बजाय यदि केवल तबादले को ही कार्रवाई या प्रताड़ना के रूप में प्रस्तुत किया गया,तो इससे पूरे प्रकरण की तस्वीर अधूरी दिखाई देती है। हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि याचिका खारिज होना डॉ. कल्याण सिंह को किसी भ्रष्टाचार या अपराध का दोषी ठहराने वाला न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। हाईकोर्ट का फैसला मुख्यतः तबादला आदेश की वैधता और उसमें न्यायिक हस्तक्षेप के प्रश्न से संबंधित था।
हाईकोर्ट का संदेश साफ—प्रशासनिक ट्रांसफर को हर बार सजा नहीं कहा जा सकता इस पूरे मामले में हाईकोर्ट का संदेश स्पष्ट है—प्रशासनिक जरूरत और जनहित में किया गया तबादला केवल शिकायत,विवाद या जांच की पृष्ठभूमि के कारण स्वतः दंडात्मक कार्रवाई नहीं बन जाता। डॉ.कल्याण सिंह जिस न्यायिक राहत की उम्मीद लेकर हाईकोर्ट पहुंचे थे, वह उन्हें नहीं मिली और उनकी रिट याचिका खारिज हो गई। अब इस प्रकरण में लोकायुक्त कार्रवाई,बरामदगी का वास्तविक रिकॉर्ड, डॉ. सिंह की भूमिका,उसके बाद जारी तबादला आदेश,पुराने प्रशासनिक विवाद और हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के तथ्य—इन सभी को न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर अलग-अलग देखना ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
रिपोर्टर - अर्जुन तिवारी
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