सिर्फ निलंबन से नहीं रुकेगी जच्चा-बच्चा की मौत! युवा समाजसेवी अविराज ने संजय गांधी अस्पताल
रीवा - शासकीय संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय में जच्चा और उसके गर्भस्थ बच्चे की मौत ने एक बार फिर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद दो डॉक्टरों और दो नर्सिंग अधिकारियों के निलंबन तथा जांच समिति के गठन को लेकर शासन और अस्पताल प्रबंधन अपनी कार्रवाई गिना रहा है,लेकिन युवा समाजसेवी अविराज ने साफ सवाल खड़ा किया है—क्या निलंबन ही इस त्रासदी का अंत है?
उन्होंने कहा कि किसी घटना के बाद कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर देना आसान कार्रवाई हो सकती है, लेकिन इससे उस व्यवस्था की जवाबदेही तय नहीं होती, जिसके भीतर लापरवाही की गुंजाइश पैदा होती है। अगर हर गंभीर घटना के बाद निलंबन ही एकमात्र समाधान है,तो सवाल यह है कि पिछली घटनाओं से व्यवस्था ने आखिर क्या सीखा?
यह कोई पहली घटना नहीं, फिर व्यवस्था क्यों नहीं सुधरती? संजय गांधी अस्पताल विंध्य क्षेत्र का सबसे बड़ा शासकीय चिकित्सा संस्थान माना जाता है। रीवा के अलावा आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में मरीज यहां उपचार के लिए पहुंचते हैं। ऐसे संस्थान में जच्चा और गर्भस्थ बच्चे की मौत जैसी घटना केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि पूरी चिकित्सा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करती है।
घटना के बाद परिजनों की ओर से इलाज में लापरवाही और दुर्व्यवहार के आरोप सामने आए हैं। घटना से पहले महिला का वीडियो भी सामने आया, जिसमें वह मदद की गुहार लगाती दिखाई दे रही है। ऐसे में अब सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब एक मरीज स्वयं मदद की गुहार लगा रही थी, तब उसे समय पर चिकित्सा सहायता और प्रभावी हस्तक्षेप क्यों नहीं मिला?
‘पावर हाउस’ रीवा में फिर जवाबदेही किसकी? रीवा को विंध्य की स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मेडिकल कॉलेज और संजय गांधी अस्पताल जैसी बड़ी संस्थाएं मौजूद होने के बावजूद यदि मरीजों को समय पर उपचार, चिकित्सकीय निगरानी और संवेदनशील व्यवहार के लिए संघर्ष करना पड़े, तो इसे केवल किसी एक कर्मचारी की गलती बताकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता।
युवा समाजसेवी अविराज का कहना है कि जांच का दायरा केवल यह तय करने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि किसे निलंबित किया जाए, बल्कि यह भी पता चलना चाहिए कि व्यवस्था की उस पूरी कड़ी में चूक कहां हुई, जिसने घटना को जन्म दिया। जांच समिति के सामने खड़े होने चाहिए ये सवाल ड्यूटी के दौरान वरिष्ठ चिकित्सकों की निगरानी और उपलब्धता की व्यवस्था क्या थी? गंभीर मरीजों के लिए निर्धारित मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं? इलाज के प्रत्येक चरण की निगरानी किस स्तर पर हो रही थी? पीजी डॉक्टरों और वरिष्ठ चिकित्सकों के बीच जिम्मेदारी की स्पष्ट व्यवस्था थी या नहीं मरीज के परिजनों की शिकायत और गुहार पर तत्काल हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ? अस्पताल में जवाबदेही की पूरी श्रृंखला किसकी है?
-ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अब तक कौन से स्थायी सुधार किए गए? क्या पूर्व में हुई घटनाओं से संबंधित जांच और कार्रवाई का कोई ठोस असर व्यवस्था पर पड़ा निलंबन कार्रवाई है, व्यवस्था सुधार का प्रमाण नहीं अविराज ने कहा कि दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई आवश्यक हो सकती है, लेकिन निलंबन को ही व्यवस्था सुधार का प्रमाण मान लेना जनता के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि हर बार घटना के बाद निलंबन होता है और कुछ समय बाद वही व्यवस्था फिर उसी ढर्रे पर लौट आती है, तो आखिर जवाबदेही किसकी है?
एक परिवार ने अपनी बेटी/बहन को खोया और उसके साथ एक अजन्मे बच्चे की जिंदगी भी खत्म हो गई। ऐसे में केवल कुछ कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई कर देना क्या उस परिवार को न्याय दिला सकता है?
अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, सिस्टम की सर्जरी चाहिए युवा समाजसेवी अविराज ने कहा कि संजय गांधी अस्पताल जैसे बड़े संस्थान में अब औपचारिक कार्रवाई नहीं,बल्कि व्यवस्था की गहन समीक्षा और स्थायी सुधार की जरूरत है।
अस्पताल में चिकित्सकों की ड्यूटी,वरिष्ठ निगरानी, आपातकालीन प्रतिक्रिया, मरीजों की शिकायतों पर तत्काल हस्तक्षेप, मेडिकल प्रोटोकॉल और अधिकारियों की जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।उन्होंने कहा कि मौत के बाद निलंबन और निलंबन के बाद फिर वही व्यवस्था—यह सिलसिला अब बंद होना चाहिए।
रीवा की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर उस व्यवस्था की जवाबदेही कौन लेगा, जिसके भरोसे मरीज अपने जीवन की सबसे कठिन घड़ी में संजय गांधी अस्पताल पहुंचते हैं? सवाल सिर्फ एक जच्चा और एक बच्चे की मौत का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जो आम आदमी सरकारी अस्पताल की चौखट पर लेकर पहुंचता है। रीवा की जनता अब निलंबन की खबर नहीं,व्यवस्था में बदलाव देखना चाहती है।
रिपोर्टर - अर्जुन तिवारी
No Previous Comments found.