हर मौत के बाद निलंबन ही क्या जवाबदेही का अंतिम पड़ाव?

स्वास्थ्य विभाग के ‘पावर हाउस’ रीवा में आखिर सिस्टम की जिम्मेदारी किसकी? — केएन सिंह

रीवा-   शासकीय संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय में जच्चा और उसके गर्भस्थ बच्चे की मौत ने एक बार फिर विंध्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।घटना के बाद दो डॉक्टरों और दो नर्सिंग अधिकारियों के निलंबन की कार्रवाई हुई और जांच समिति का गठन भी किया गया।लेकिन बड़ा सवाल अब भी सामने खड़ा है—

क्या हर मौत के बाद कुछ कर्मचारियों का निलंबन ही जवाबदेही का अंतिम पड़ाव है?

मानवाधिकार आयोग परिषद जनचेतना समिति के राष्ट्रीय महासचिव केएन सिंह ने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए कहा है कि हर गंभीर घटना के बाद कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर देना और फिर पूरी व्यवस्था को उसी ढर्रे पर छोड़ देना, जवाबदेही नहीं बल्कि समस्या को टालने जैसा है।

हर मौत के बाद कुछ लोग निलंबित… लेकिन सिस्टम का जिम्मेदार कौन?

केएन सिंह का सवाल है—

अगर लगातार गंभीर घटनाएं होती रहें और हर बार कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई के बाद मामला शांत हो जाए, तो उस पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी आखिर कौन तय करेगा, जिसमें लापरवाही की गुंजाइश पैदा होती है?

एक मरीज की जान बचाने के लिए बनाई गई पूरी चिकित्सकीय व्यवस्था आखिर किस स्तर पर विफल हुई?

क्या सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करने से उन अधिकारियों और व्यवस्थागत कमियों की जिम्मेदारी तय हो जाएगी, जिनकी निगरानी में पूरा तंत्र संचालित होता है?

विंध्य का ‘पावर हाउस’… फिर मरीजों की सुरक्षा सवालों में क्यों?

रीवा का संजय गांधी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज पूरे विंध्य क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

रीवा के अलावा आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं।

ऐसे में जच्चा और उसके गर्भस्थ बच्चे की मौत को सिर्फ एक परिवार की निजी त्रासदी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यह घटना अस्पताल की चिकित्सकीय निगरानी, आपातकालीन व्यवस्था और जवाबदेही की पूरी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

परिजनों की ओर से इलाज में लापरवाही और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए हैं।

घटना से पहले महिला का एक वीडियो सामने आने की बात भी कही जा रही है, जिसमें वह मदद की गुहार लगाती दिखाई देती है।

अगर ऐसा है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है—

जब एक मरीज मदद मांग रही थी, तब अस्पताल की व्यवस्था ने उसकी पुकार को समय रहते गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

जांच सिर्फ निलंबन तय करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए

केएन सिंह का कहना है कि जांच समिति की भूमिका सिर्फ यह तय करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि किसे निलंबित किया जाए।

जांच का दायरा पूरी व्यवस्था तक जाना चाहिए।

जांच में यह सामने आना चाहिए कि—

  • गंभीर मरीज के लिए निर्धारित मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं?
  • ड्यूटी के दौरान वरिष्ठ चिकित्सकों की उपलब्धता और निगरानी कैसी थी?
  • इलाज के प्रत्येक चरण की जिम्मेदारी किसकी थी?
  • पीजी डॉक्टरों और वरिष्ठ चिकित्सकों के बीच जिम्मेदारियां स्पष्ट थीं या नहीं?
  • मरीज या परिजनों की शिकायत पर तत्काल हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ?
  • आपात स्थिति में अस्पताल की रिस्पॉन्स प्रणाली कितनी प्रभावी थी?
  • मरीज की हालत बिगड़ने के बाद निर्णय लेने में कहीं देरी तो नहीं हुई?
  • जवाबदेही की पूरी श्रृंखला आखिर किस अधिकारी तक पहुंचती है?
  • पहले हुई ऐसी घटनाओं से अस्पताल ने क्या सबक लिया?
  • और सबसे महत्वपूर्ण—भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थायी सुधार क्या किए गए?

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