कल्पना मिश्रा मौत मामला,अब खुलेगा इलाज से लेकर कथित अवैध मांग तक का पूरा सच
रीवा : कलेक्टर ने दिए मजिस्ट्रियल जांच के आदेश,एसडीएम सिरमौर दृष्टि जायसवाल करेंगी जांच,30 दिन में देनी होगी तथ्यात्मक रिपोर्ट—डॉक्टर,नर्सिंग स्टाफ से लेकर अधीक्षक और डीन तक की भूमिका जांच के घेरे में,दरअसल पूरा मामला रीवा जिले संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय का है जहां विगत दिवस प्रसूता कल्पना मिश्रा और उनके नवजात शिशु की हुई मौत का मामला अब प्रशासनिक जांच के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने 4 सितंबर 2026 को मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। एसडीएम सिरमौर दृष्टि जायसवाल (आईएएस) को जांच अधिकारी बनाया गया है।मजिस्ट्रियल जांच का दायरा महज अस्पताल में हुए उपचार तक सीमित नहीं रखा गया है। आदेश में भर्ती से पहले की गर्भावस्था संबंधी चिकित्सकीय जांच से लेकर अस्पताल में भर्ती, उपचार, प्रसव, मौत की परिस्थितियों और परिजनों से कथित तौर पर अवैध लाभ की मांग किए जाने तक के बिंदुओं को जांच में शामिल किया गया है। इससे अस्पताल की चिकित्सकीय और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर सवालों की पड़ताल का रास्ता खुल गया है।
भर्ती से मौत तक—हर कड़ी की होगी पड़ताल
जांच अधिकारी यह पता लगाएंगी कि कल्पना मिश्रा अस्पताल में कब और किन परिस्थितियों में भर्ती हुई थीं। गर्भावस्था के दौरान उनके कराए गए चिकित्सकीय परीक्षण, मिली सलाह और उपचार का भी परीक्षण किया जाएगा।
इसके बाद अस्पताल में भर्ती होने से लेकर प्रसूता और नवजात की मृत्यु तक के पूरे घटनाक्रम को रिकॉर्ड और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर खंगाला जाएगा। उपचार के दौरान कौन-से चिकित्सकीय निर्णय लिए गए, किस समय क्या उपचार किया गया और किन परिस्थितियों में दोनों की मौत हुई—इन सभी सवालों के जवाब जांच में तलाशे जाएंगे।
सबसे गंभीर सवाल—क्या परिजनों से मांगा गया था अवैध लाभ?
मजिस्ट्रियल जांच में शामिल प्रमुख बिंदुओं में से एक कथित अवैध लाभ की मांग भी है। जांच अधिकारी यह पता लगाएंगी कि उपचार के दौरान किसी व्यक्ति ने प्रसूता के परिजनों से किसी प्रकार के अवैध लाभ की मांग या आकांक्षा की थी अथवा नहीं।
यदि जांच में इस संबंध में कोई तथ्य सामने आता है तो उसे रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाएगा। ऐसे में यह जांच केवल चिकित्सकीय लापरवाही के सवाल तक सीमित न रहकर अस्पताल में इलाज के दौरान कथित अनियमितताओं की भी पड़ताल करेगी।
डॉक्टर से डीन तक—जिम्मेदारी की पूरी चेन जांच के घेरे में
मामले में जांच का दायरा व्यापक रखा गया है। इलाज में शामिल डॉक्टरों, नर्सिंग एवं पैरामेडिकल स्टाफ के साथ स्त्रीरोग विभागाध्यक्ष, अस्पताल अधीक्षक, मेडिकल कॉलेज के डीन तथा अन्य संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जाएगी।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि इलाज के दौरान क्या हुआ, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि संबंधित स्तर पर किसकी क्या जिम्मेदारी थी और पूरी व्यवस्था ने घटना के दौरान किस तरह काम किया।
तकनीकी विशेषज्ञों की भी ली जा सकेगी मदद
कलेक्टर ने जांच अधिकारी को आवश्यकता पड़ने पर तकनीकी अधिकारियों की सहायता लेने की अनुमति दी है। इसके अलावा घटना की तकनीकी जांच के लिए गठित राज्य स्तरीय जांच दल की रिपोर्ट को भी मजिस्ट्रियल जांच में शामिल किया जाएगा।
इससे मजिस्ट्रियल जांच में प्रशासनिक तथ्यों के साथ चिकित्सकीय और तकनीकी निष्कर्षों को भी आधार बनाया जा सकेगा।
30 दिन में सामने आएगा प्रशासनिक जांच का निष्कर्ष
कलेक्टर के आदेश के अनुसार जांच अधिकारी को 30 दिनों के भीतर जांच पूरी कर स्पष्ट अभिमत के साथ तथ्यात्मक प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच रिपोर्ट में क्या सामने आता है? क्या उपचार में कोई गंभीर चूक या लापरवाही सामने आती है? क्या किसी स्तर पर जिम्मेदारी तय होती है? क्या कथित अवैध लाभ की मांग के आरोपों की पुष्टि होती है? और यदि अनियमितता मिलती है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार ठहराया जाता है?
इन सवालों के जवाब अब मजिस्ट्रियल जांच की रिपोर्ट से सामने आने की उम्मीद है।
अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों के बीच बड़ा कदम
कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल की कार्यप्रणाली और उपचार व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। मामले में कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने की मांग लगातार उठती रही है।
ऐसे में कलेक्टर द्वारा मजिस्ट्रियल जांच के आदेश को महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। अब जांच अधिकारी के सामने सिर्फ मौत की परिस्थितियां ही नहीं, बल्कि इलाज की पूरी प्रक्रिया, संबंधित चिकित्सकीय एवं प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका और कथित अनियमितताओं की भी जांच की जिम्मेदारी है।
फिलहाल निगाहें उस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक और चिकित्सकीय स्तर पर आखिर क्या तथ्य सामने आते हैं और जिम्मेदारी किस स्तर तक पहुंचती है।
रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी
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