जेसीबी के नाम पर नगर परिषद में 95.34 लाख के भुगतान पर सवाल, 23.99 लाख की वसूली की मांग

रीवा : ऑडिट आपत्तियों ने खोली भुगतान व्यवस्था की परतें, बाजार दर से अधिक रेट पर जेसीबी चलाने का आरोप! डीजल भुगतान से लेकर पूरे साल मशीन के इस्तेमाल तक सवालों के घेरे में व्यवस्था!

एडवोकेट प्रशांत त्रिपाठी ने आयुक्त से की शिकायत, तत्कालीन प्रभारी सीएमओ की भूमिका की जांच की मांग

नगर परिषद रामपुर बाघेलान में जेसीबी मशीन और मुरूम के नाम पर हुए भुगतान अब गंभीर सवालों के घेरे में हैं। स्थानीय निधि संपरीक्षा की ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए एडवोकेट प्रशांत कुमार त्रिपाठी ने नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के आयुक्त,भोपाल को शिकायत भेजकर कथित अनियमित भुगतान की जांच,जिम्मेदारों पर कार्रवाई और 23 लाख 99 हजार 135.20 रुपये की वसूली की मांग की है।शिकायत में दावा किया गया है कि वर्ष 2020-21 से 2023-24 तक की ऑडिट रिपोर्ट में जेसीबी और मुरूम से जुड़े भुगतान में गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। आवेदन के अनुसार,ऑडिट परीक्षण में कुल 95 लाख 34 हजार 358 रुपये के भुगतान को लेकर सवाल उठाए गए हैं, जबकि 23.99 लाख रुपये की राशि को अधिक भुगतान के रूप में वसूली योग्य बताया गया है।
1450 रुपये प्रति घंटे की जेसीबी,बाजार दर 950 रुपये बताई
शिकायत में ऑडिट रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि वित्तीय वर्ष 2019-20 में नगर परिषद ने जेसीबी मशीन उपलब्ध कराने के लिए निविदा प्रक्रिया की थी। इसमें बीके ग्रुप के लिए जेसीबी की दर 1,450 रुपये प्रति घंटे स्वीकृत होने का उल्लेख है।
वहीं, शिकायतकर्ता के अनुसार ऑडिट परीक्षण में प्रचलित बाजार दर करीब 950 रुपये प्रति घंटे पाई गई। यानी प्रति घंटे करीब 500 रुपये के अंतर को लेकर ऑडिट में आपत्ति का उल्लेख किया गया है।मुरूम गिराने के लिए भी 410 रुपये प्रति क्यूबिक की दर का उल्लेख है,जबकि शिकायत में बाजार दर करीब 350 रुपये होने का दावा किया गया है। इन्हीं दरों के अंतर और भुगतान की गणना के आधार पर करीब 23.99 लाख रुपये की आर्थिक क्षति का मुद्दा उठाया गया है।
डीजल का पैसा भी नगर परिषद से? ऑडिट आपत्ति से बढ़ा विवाद
मामला केवल जेसीबी की दरों तक सीमित नहीं है। शिकायत के अनुसार, बीके ग्रुप को मुरूम बिछाने और नाली साफ-सफाई जैसे कार्यों के लिए अनुबंधित किया गया था। इसके बावजूद जेसीबी के डीजल खर्च का भुगतान नगर परिषद की निधि से किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि कार्यादेश में डीजल व्यय का स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के बावजूद नगर परिषद निधि से इसका भुगतान किया गया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब मशीन का भुगतान ठेकेदार को किया जा रहा था, तो डीजल का अतिरिक्त भार नगर परिषद की निधि पर क्यों डाला गया?
पूरे साल जेसीबी चलने का हिसाब भी जांच के घेरे में
ऑडिट आपत्तियों के हवाले से शिकायत में जेसीबी के पूरे वर्ष उपयोग और मुरूम गिराने से संबंधित भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने भुगतान से जुड़े कार्यादेश, माप पुस्तिका, बिल, उपयोग अवधि और वास्तविक कार्य की जांच कराने की मांग की है।
अब जांच का अहम बिंदु यह होगा कि जिन कार्यों के लिए भुगतान किया गया, वे वास्तव में कितनी मात्रा और कितने समय में कराए गए तथा भुगतान की गई राशि का वास्तविक कार्य से कितना संबंध है।
तत्कालीन प्रभारी सीएमओ की भूमिका पर भी उठे सवाल
शिकायत में तत्कालीन प्रभारी सीएमओ एवं मूल पद से उपयंत्री विश्वजीत कुशवाहा की भूमिका की जांच की मांग भी की गई है। आवेदक ने सवाल उठाया है कि उन्हें नगर परिषद सीएमओ का प्रभार किस सक्षम अधिकारी के आदेश से दिया गया था।
शिकायतकर्ता ने संबंधित आदेश,प्रभार की वैधानिकता और जेसीबी-मुरूम से जुड़े भुगतान की स्वीकृति प्रक्रिया की जांच कराने की मांग की है। यदि जांच में वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होती है तो भुगतान प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने की मांग भी की गई है।
अब आयुक्त की जांच पर टिकी निगाहें
एडवोकेट प्रशांत कुमार त्रिपाठी ने 28 सितंबर 2026 को आयुक्त, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग को शिकायत आवेदन प्रस्तुत किया है। आवेदन के साथ ऑडिट रिपोर्ट के दो पृष्ठ संलग्न किए जाने का उल्लेख है।शिकायत में मांग की गई है कि ऑडिट में दर्ज आपत्तियों की स्वतंत्र जांच कराई जाए, अधिक अथवा नियम विरुद्ध भुगतान की पुष्टि होने पर संबंधित ठेकेदार एवं जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों से राशि की वसूली की जाए और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
अब बड़ा सवाल यही है कि ऑडिट में दर्ज आपत्तियों पर नगरीय प्रशासन विभाग कितनी गंभीरता से जांच करता है और यदि भुगतान में अनियमितता साबित होती है तो 23.99 लाख रुपये की वसूली के साथ जिम्मेदारी किस-किस पर तय होती है।

रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी

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