कल्पना मिश्रा मौत मामला दो महीने बाद भी जांच रिपोर्ट का अता-पता नहीं,आखिर किसे बचा रहा प्रशासन?
रीवा : रीवा जिले के संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) में कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत के करीब दो महीने बीत चुके हैं,लेकिन मजिस्ट्रियल जांच की रिपोर्ट को लेकर अब भी स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। एक महीने के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन निर्धारित समयसीमा गुजरने के बाद भी पीड़ित परिवार को इंतजार करना पड़ रहा है। आखिर जांच कहां अटकी है? रिपोर्ट तैयार है तो सामने क्यों नहीं आ रही? और यदि जांच अधूरी है, तो समयसीमा में इसे पूरा क्यों नहीं किया गया?
28 अक्टूबर को मृतका के पिता रामशिरोमणि मिश्रा का कलेक्ट्रेट पहुंचना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जिस पिता ने बेटी और नवजात नाती को खोने के बाद न्याय की मांग में 15 दिन तक आमरण अनशन किया, उसे दो महीने बाद भी जांच की स्थिति जानने के लिए प्रशासन के दरवाजे पर पहुंचना पड़ रहा है। यह केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि सरकारी अस्पतालों में जवाबदेही और प्रशासनिक जांच की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।
एक महीने में रिपोर्ट का आदेश,फिर दो महीने बाद भी इंतजार क्यों?
26 अगस्त 2026 को कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत के बाद परिजनों ने इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए थे। परिवार ने जिम्मेदार चिकित्सकों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए न्याय के लिए आंदोलन किया।मामले की गंभीरता को देखते हुए 4 सितंबर को मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए गए। जांच की जिम्मेदारी सिरमौर की तत्कालीन एसडीएम दृष्टि जायसवाल को सौंपी गई थी। उन्हें सात बिंदुओं पर जांच कर एक महीने के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।जांच में गर्भावस्था के दौरान हुए परीक्षण, अस्पताल में भर्ती होने से लेकर मौत तक की घटनाएं, उपचार में शामिल डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका तथा परिजनों के आरोपों की पड़ताल की जानी थी। राज्यस्तरीय तकनीकी जांच दल की रिपोर्ट को भी जांच प्रक्रिया में शामिल किया जाना था।जब जांच के बिंदु निर्धारित थे, जांच अधिकारी नियुक्त थीं और रिपोर्ट के लिए समयसीमा भी तय थी, तो फिर देरी किस वजह से हुई?
बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन के लिए जांच की समयसीमा केवल कागजों तक सीमित है? यदि ऐसा नहीं है, तो अब तक रिपोर्ट की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? क्या जांच अधिकारी से जवाब मांगा गया है? क्या किसी स्तर पर फाइल लंबित है? यदि हां, तो जिम्मेदार कौन है?
इन सवालों पर प्रशासन की चुप्पी परिवार की बेचैनी बढ़ा रही है।
12 से 24 सितंबर तक सुनवाई,फिर जांच किस मोड़ पर अटकी?
जांच के तहत 12 से 24 सितंबर के बीच कलेक्टर कार्यालय में सुनवाई निर्धारित की गई थी। पीड़ित पक्ष, प्रत्यक्षदर्शियों और घटना से संबंधित जानकारी रखने वाले लोगों को बयान तथा साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया था।
सुनवाई की प्रक्रिया निर्धारित होने के बावजूद 28 अक्टूबर तक परिवार की ओर से रिपोर्ट नहीं मिलने की शिकायत सामने आई है। अब प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि सुनवाई पूरी होने के बाद जांच में क्या प्रगति हुई? तकनीकी जांच दल की रिपोर्ट का परीक्षण हुआ या नहीं? और अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने में देरी की वास्तविक वजह क्या है?
सवाल सीधा है—जब बयान और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया के लिए तारीखें तय थीं,तो रिपोर्ट के लिए अनिश्चितकालीन इंतजार क्यों?
प्रशासन को यह भी बताना चाहिए कि रिपोर्ट कब तक प्रस्तुत की जाएगी, परिवार को उसकी प्रति किस प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कराई जाएगी और जांच के निष्कर्षों पर आगे की कार्रवाई कब होगी।
निलंबन और तबादले हुए, लेकिन मौत की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
इस मामले में शुरुआती कार्रवाई के तौर पर दो डॉक्टरों और दो नर्सिंग अधिकारियों को निलंबित किया गया था। अस्पताल के तत्कालीन अधीक्षक को पद से हटाया गया और मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन डीन का तबादला भी किया गया था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या निलंबन और तबादले ही जवाबदेही का अंतिम रूप हैं?
कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत किन परिस्थितियों में हुई? क्या उपचार के दौरान लापरवाही हुई थी? यदि हुई, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है? क्या जांच में किसी चिकित्सक या कर्मचारी की भूमिका सामने आई है? यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तो उसके आधार और निष्कर्ष भी स्पष्ट किए जाने चाहिए।
अधिकारियों को पदों से हटाना और कर्मचारियों को निलंबित करना एक बात है, जबकि मौत के कारणों की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी निर्धारित करना दूसरी।
परिवार को केवल कार्रवाई की खबर नहीं, बल्कि जांच के निष्कर्षों और आगे की प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी चाहिए। दोष तय करना जांच और कानूनी प्रक्रिया का विषय है, लेकिन जांच की प्रगति पर सवाल उठाना परिवार का अधिकार है।
15 दिन आमरण अनशन पर बैठा पिता,अब भी न्याय की प्रतीक्षा
बेटी और नवजात नाती की मौत के बाद रामशिरोमणि मिश्रा 2 सितंबर से 16 सितंबर तक न्याय की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तबीयत बिगड़ने का हवाला देते हुए प्रशासन ने उन्हें धरनास्थल से हटाकर जिला अस्पताल में भर्ती कराया था।एक पिता के लिए अपनी बेटी और नवजात नाती को खोने का दर्द शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। इसके बावजूद परिवार को न्याय की मांग के लिए आंदोलन करना पड़ा और अब जांच रिपोर्ट की स्थिति जानने के लिए दोबारा कलेक्ट्रेट पहुंचना पड़ा।
क्या प्रशासन को यह एहसास है कि जांच में देरी का हर दिन उस परिवार की पीड़ा और अनिश्चितता को बढ़ा रहा है?
जब जांच के आदेश जारी हो चुके हैं, सुनवाई की प्रक्रिया निर्धारित हो चुकी है और परिवार अपना पक्ष रख चुका है, तो उसे बार-बार अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने की नौबत क्यों आ रही है?
यह सवाल प्रशासन की संवेदनशीलता और जवाबदेही, दोनों पर खड़ा होता है।
मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जवाब दें—रिपोर्ट कहां है?
रीवा का यह मामला अब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही से आगे बढ़कर राज्य सरकार के सामने भी सवाल खड़ा करता है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल और जिला प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि
- क्या मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट प्रस्तुत हो चुकी है?
- यदि रिपोर्ट तैयार नहीं है, तो निर्धारित समयसीमा में जांच पूरी क्यों नहीं हुई?
- क्या जांच अधिकारी से देरी को लेकर जवाब मांगा गया है?
- राज्यस्तरीय तकनीकी जांच दल के निष्कर्षों को मजिस्ट्रियल जांच में शामिल किया गया है या नहीं?
- परिवार को जांच रिपोर्ट की प्रति कब उपलब्ध कराई जाएगी?
- जांच में यदि किसी की जिम्मेदारी सामने आती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की समयसीमा क्या होगी?
इन सवालों का जवाब केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि तथ्यों और स्पष्ट समयसीमा के साथ दिया जाना चाहिए।
यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो उसकी वर्तमान स्थिति और निष्कर्षों के बारे में नियमानुसार जानकारी दी जाए। यदि जांच लंबित है, तो देरी का वास्तविक कारण बताया जाए और रिपोर्ट प्रस्तुत करने की निश्चित समयसीमा स्पष्ट की जाए।
अब तारीख नहीं, जवाबदेही तय होनी चाहिए
सरकारी अस्पताल में मां और नवजात की मौत के बाद जांच के आदेश जारी होना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि जांच समयबद्ध तरीके से पूरी हो और उसके निष्कर्षों के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
कल्पना मिश्रा का मामला प्रशासन के सामने एक सीधा सवाल रखता है—क्या जांच की समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने वाला कोई तंत्र है? यदि है, तो इस मामले में उसकी भूमिका क्या रही? और यदि तय समय में रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं हुई, तो इसके लिए जवाबदेही किसकी होगी?
सबसे बड़ा सवाल: जब एक महीने में जांच रिपोर्ट देने के निर्देश थे, तो करीब दो महीने बाद भी परिवार को स्पष्ट जवाब क्यों नहीं मिला?
क्या प्रशासन इस मामले में रिपोर्ट की स्थिति सार्वजनिक करेगा? क्या देरी के कारणों की समीक्षा होगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी?
अब परिवार को केवल अगली तारीख या नए आश्वासन की नहीं, बल्कि जांच की वास्तविक स्थिति, रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समयसीमा और आगे की कार्रवाई पर स्पष्ट जवाब चाहिए।
कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत का सच सामने लाना केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जनता का भरोसा कायम रखने का सवाल है।
रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी

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