पत्नी और गर्भस्थ शिशु की मौत पर न्याय मांग रहे दिव्यांग पति का आरोप

रेवा : खबर मध्यप्रदेश के रीवा जिले के जवा थाना क्षेत्र से है जहां पर पत्नी और गर्भस्थ शिशु की मौत के मामले में न्याय के लिए संघर्ष कर रहे एक श्रवण दिव्यांग व्यक्ति ने अब पुलिस की कार्यप्रणाली को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि अष्टभुजा हॉस्पिटल प्रकरण की जांच की जानकारी मांगने पर जवा थाना प्रभारी उपनिरीक्षक अरविंद सिंह राठौड़ ने उनका व्हाट्सऐप नंबर ब्लॉक कर दिया। सवाल यह है कि जब पीड़ित फोन पर सुनने और बातचीत करने में असमर्थ है,तब लिखित संवाद का एकमात्र सहारा भी बंद कर देना कहां तक उचित है?

ग्राम घोरहा तुर्कगोंदर,पोस्ट गढ़ी सोहरवा,तहसील त्योंथर निवासी रावेंद्र सिंह ने इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,नई दिल्ली में शिकायत दर्ज कराई है। आयोग के 11 सितंबर 2026 के प्राप्ति पत्र के अनुसार शिकायत डायरी क्रमांक 21257/N/2026 के तहत दर्ज की गई है। शिकायत में पुलिस के कथित व्यवहार के साथ दिव्यांग व्यक्ति के अधिकारों और भेदभाव का मुद्दा भी उठाया गया है।

सवाल पूछे तो संवाद का रास्ता ही बंद करने का आरोप

शिकायतकर्ता के मुताबिक, उनकी पत्नी की 17 मार्च 2024 को अष्टभुजा हॉस्पिटल,जवा में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। इस घटना में उन्होंने अस्पताल प्रबंधन और कर्मचारियों पर गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही, कथित तौर पर आवश्यक मेडिकल योग्यता के बिना इलाज तथा ऑपरेशन थिएटर में बंधक बनाए जाने जैसे आरोप लगाए हैं।

रावेंद्र सिंह का आरोप है कि वह मामले की जांच की प्रगति जानने के लिए थाना प्रभारी को लगातार व्हाट्सऐप पर लिखित संदेश भेज रहे थे। लेकिन सवालों का जवाब देने के बजाय उनका नंबर ब्लॉक कर दिया गया और थाने आकर मिलने की बात कही गई। पीड़ित का कहना है कि उनकी श्रवण दिव्यांगता पुलिस को पता है,इसके बावजूद लिखित संवाद का विकल्प बंद करना उनके लिए न्याय की प्रक्रिया को और कठिन बना रहा है।

अस्पताल की मेडिकल डिग्रियों से लेकर CDR तक जांच की मांग

पीड़ित ने शिकायत में अष्टभुजा हॉस्पिटल प्रकरण की जांच पर भी कई गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने घटना के समय अस्पताल में मौजूद बताए गए कर्मचारियों और संबंधित व्यक्तियों की शैक्षणिक एवं मेडिकल डिग्रियों का सत्यापन कराने की मांग की है।
शिकायत में नितेश सिंह, अवनीश सिंह,अस्पताल संचालक योगेश कुमार,कृष्ण तिवारी,अंजू विश्वकर्मा,गौहर अली, विकास दुबे, डीके सिंह, डॉ. एलएस मिश्रा और दिनेश सेन के नामों का उल्लेख किया गया है।
इसके साथ ही पुलिस द्वारा निकलवाई गई कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) के आधार पर संबंधित मोबाइल नंबरों की एसडीआर जांच, घटना के समय आपसी संपर्क में रहे लोगों की पहचान और सभी संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाने की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है।

मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा मामला,अब पुलिस की जवाबदेही पर सवाल

रावेंद्र सिंह ने मांग की है कि थाना प्रभारी द्वारा व्हाट्सऐप नंबर ब्लॉक किए जाने के आरोप की निष्पक्ष जांच कराई जाए। उनकी दिव्यांगता को देखते हुए व्हाट्सऐप या किसी अन्य लिखित माध्यम से संवाद की स्थायी व्यवस्था बनाई जाए तथा अष्टभुजा हॉस्पिटल प्रकरण में अब तक हुई जांच,लंबित कार्रवाई और जांच की वर्तमान स्थिति की लिखित जानकारी उपलब्ध कराई जाए।उन्होंने यह भी मांग की है कि आरोपों की पुष्टि होने पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाए।

बड़ा सवाल: दिव्यांग पीड़ित को न्याय मांगने के लिए आखिर किस दरवाजे पर जाना होगा?

पत्नी और गर्भस्थ शिशु को खो चुका व्यक्ति पुलिस से सिर्फ अपनी शिकायत की जांच का हिसाब मांग रहा है। वह सुन नहीं सकता, इसलिए लिखकर संवाद करता है। ऐसे में यदि उसका आरोप सही है कि पुलिस अधिकारी ने उसका नंबर ब्लॉक कर दिया, तो यह केवल संवाद का मामला नहीं,बल्कि दिव्यांग व्यक्ति की शिकायत सुनने और उसे जानकारी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल है।
क्या पुलिस के पास श्रवण दिव्यांग शिकायतकर्ता से संवाद करने का कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं है? अष्टभुजा हॉस्पिटल प्रकरण में मेडिकल डिग्रियों का सत्यापन हुआ या नहीं? CDR और एसडीआर की जांच में क्या सामने आया? संबंधित लोगों के बयान दर्ज हुए या नहीं? और सबसे अहम—17 मार्च 2024 की घटना के बाद पीड़ित को अब तक जांच की स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं मिल पाई?
फिलहाल ये सभी आरोप और मांगें शिकायतकर्ता रवींद्र सिंह की ओर से उठाई गई हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज होने के बाद अब जवा पुलिस और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही महत्वपूर्ण हो गई है। थाना प्रभारी अरविंद सिंह राठौड़ एवं पुलिस विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।

रिपोर्टर : अर्जुन  तिवारी 

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