पत्नी की मौत का सच दबाने का आरोप,अब NHRC ने रीवा SP को घेरा! आठ सप्ताह में कार्रवाई का अल्टीमेटम

रेवा : अष्टभुजा हॉस्पिटल मौत मामले में दिव्यांग पति की शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सख्त; जांच में पीड़ित को शामिल करने और कार्रवाई का परिणाम बताने के निर्देश। पुरानी पुलिस जांच पर गंभीर सवाल, CDR में सामने आए नंबरों के बावजूद आरोपियों से पूछताछ नहीं होने का दावा।

दरअसल पूरा मामला रीवा जिले के जवा थाना क्षेत्र से है जहां पर पत्नी की मौत का सच जानने के लिए करीब ढाई साल से पुलिस थानों और अधिकारियों के चक्कर काट रहे एक श्रवण दिव्यांग पति की शिकायत अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तक पहुंच गई है। अष्टभुजा हॉस्पिटल, जवा में 17 मार्च 2024 को हुई महिला की मौत के मामले में आयोग ने रीवा पुलिस अधीक्षक को कार्रवाई के लिए शिकायत भेजते हुए आठ सप्ताह के भीतर उचित कार्रवाई करने और उसका परिणाम शिकायतकर्ता को बताने के निर्देश दिए हैं।
मामला केवल एक महिला की मौत का नहीं,बल्कि पुलिस की जांच प्रक्रिया,संदिग्धों की भूमिका, अस्पताल में इलाज करने वालों की शैक्षणिक योग्यता और महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर कार्रवाई का भी है। पीड़ित रावेंद्र सिंह का आरोप है कि जवा पुलिस ने शुरुआत से ही मुख्य आरोपियों को बचाने का प्रयास किया। जांच अधिकारी ने जल्दबाजी में जांच पूरी कर मामले को बंद कर दिया, जबकि बाद में उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों और लगातार शिकायतों के बाद सितंबर 2024 में जांच दोबारा शुरू हुई। इसके बावजूद अब तक मुख्य आरोपियों तक पुलिस नहीं पहुंच सकी है।अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप ने रीवा पुलिस के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर एक दिव्यांग पति को अपनी पत्नी की मौत के मामले में निष्पक्ष जांच के लिए आयोग का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा?
NHRC का हस्तक्षेप, SP को आठ सप्ताह की समय-सीमा
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कानून प्रभाग की ओर से 2 नवंबर 2026 को भेजे गए ईमेल के अनुसार, रावेंद्र सिंह की 11 सितंबर 2026 को प्राप्त शिकायत पर आयोग ने विचार किया। इसके बाद शिकायत को आवश्यक कार्रवाई के लिए पुलिस अधीक्षक रीवा के पास भेजा गया। सहायक रजिस्ट्रार (कानून) अतुल कुमार ने आयोग के निर्देशानुसार शिकायत की स्कैन प्रति एसपी रीवा को प्रेषित की।
आयोग ने संबंधित अधिकारी को निर्देशित किया है कि शिकायतकर्ता/पीड़ित को जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया में शामिल किया जाए तथा आठ सप्ताह के भीतर उचित कार्रवाई कर उसके परिणाम से शिकायतकर्ता को अवगत कराया जाए।
यह निर्देश पुलिस के लिए महज एक औपचारिक पत्र नहीं, बल्कि जांच की जवाबदेही तय करने का अवसर है। अब देखना होगा कि पुलिस केवल कागजी कार्रवाई करती है या वास्तव में उन सवालों के जवाब तलाशती है, जिन्हें पीड़ित लंबे समय से उठा रहा है।

पांच दिन में जांच पूरी, मुख्य आरोपियों को कथित तौर पर दे दी गई क्लीन चिट!

रावेंद्र सिंह ने तत्कालीन जांच अधिकारी उपनिरीक्षक शैलेन्द्र सिंह पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि घटना के समय जवा थाने में पदस्थ शैलेन्द्र सिंह ने जांच के दौरान मुख्य आरोपियों की भूमिका की निष्पक्ष पड़ताल नहीं की। पीड़ित के मुताबिक, जांच रिपोर्ट में ऐसे लोगों के नाम शामिल किए गए, जो घटना से कई महीने पहले ही अस्पताल छोड़ चुके थे या वहां कार्यरत ही नहीं थे।
आरोप है कि जुलाई 2024 में महज पांच दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट तैयार कर दी गई और घटना में अपराध घटित नहीं होने का हवाला देते हुए मामले को समाप्त कर दिया गया। पीड़ित का यह भी आरोप है कि रिपोर्ट में मुख्य आरोपियों के नाम-पते दर्ज करने के बजाय केवल 'कंपाउंडर' लिखकर जिम्मेदारी पूरी कर दी गई।

रावेंद्र सिंह का सवाल है कि जब जांच रिपोर्ट में कुछ व्यक्तियों के नाम शामिल किए गए थे तो उनके बयान दर्ज क्यों नहीं किए गए? मुख्य आरोपियों से पूछताछ क्यों नहीं हुई? और यदि जांच निष्पक्ष थी तो बाद में सितंबर 2024 में शिकायतों और साक्ष्यों के आधार पर जांच दोबारा क्यों खोलनी पड़ी?
ये सभी आरोप पुलिस जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। हालांकि, तत्कालीन जांच अधिकारी का पक्ष सामने आना बाकी है।
थाना प्रभारी ने व्हाट्सऐप ब्लॉक किया,दिव्यांग पीड़ित जानकारी के लिए कहां जाए?
पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए रावेंद्र सिंह ने वर्तमान जवा थाना प्रभारी अरविंद सिंह राठौड़ पर भी उनका व्हाट्सऐप नंबर ब्लॉक करने का आरोप लगाया है।

पीड़ित का कहना है कि पत्नी की मौत के मामले में जांच की प्रगति जानने और आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिए वह लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन थाना प्रभारी द्वारा नंबर ब्लॉक किए जाने से संवाद का रास्ता बंद हो गया।

सवाल यह है कि जब एक श्रवण दिव्यांग व्यक्ति अपनी पत्नी की मौत के मामले में जांच की जानकारी मांग रहा है, तो क्या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं बनती कि उसे उचित माध्यम से जानकारी उपलब्ध कराई जाए? क्या शिकायतकर्ता को अपनी ही शिकायत की स्थिति जानने के लिए बार-बार अधिकारियों के दरवाजे खटखटाने पड़ेंगे?

इस आरोप पर थाना प्रभारी और पुलिस प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।

CDR और टावर लोकेशन में कई नंबर, फिर भी पूछताछ क्यों नहीं?

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और टावर लोकेशन को लेकर उठाए जा रहे हैं।

रावेंद्र सिंह का दावा है कि तत्कालीन थाना प्रभारी कमलेश साहू के कार्यकाल में उनकी मांग पर CDR और टावर लोकेशन निकलवाई गई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार, उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए कई मोबाइल नंबर घटना के समय आपस में संपर्क में थे।
पीड़ित ने जिन लोगों की भूमिका की जांच की मांग की है, उनमें अस्पताल संचालक योगेश कुमार, नितेश सिंह, अवनीश उर्फ लकी सिंह, अंजू विश्वकर्मा, एंबुलेंस चालक धर्मेंद्र मिश्रा, अस्पताल खुलवाने वाली कर्मचारी अंकिता सिंह, भवन मालिक का पुत्र विकास दुबे, गौहर अली, दिलीप सेन और तीन अज्ञात व्यक्ति शामिल हैं।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन लोगों के संबंध में उपलब्ध कराए गए तथ्यों के बावजूद न तो सभी के बयान दर्ज किए गए और न ही उनकी भूमिका की गंभीरता से जांच हुई।
इतना ही नहीं, पीड़ित ने दावा किया है कि सीजेरियन ऑपरेशन के लिए बाहर से बुलाए गए दो अज्ञात डॉक्टर महिला की मौत के बाद कार से मौके से चले गए थे। उनका आरोप है कि पुलिस आज तक उन डॉक्टरों की पहचान तक नहीं कर सकी।
यदि CDR और अन्य तकनीकी साक्ष्य उपलब्ध हैं, तो उनकी जांच किस स्तर तक पहुंची? संदिग्ध नंबरों के धारकों से पूछताछ क्यों नहीं हुई? बाहर से बुलाए गए डॉक्टरों की पहचान के लिए क्या प्रयास किए गए? इन सवालों का जवाब अब पुलिस को देना होगा।
अस्पताल में इलाज करने वालों की डिग्री का सत्यापन होगा या नहीं?
पीड़ित ने अस्पताल में इलाज करने वाले कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल डिग्रियों के सत्यापन की भी मांग की है। उनका आरोप है कि बिना आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता वाले कर्मचारियों ने मरीज का इलाज किया और सीजेरियन डिलीवरी के दौरान ऑपरेशन थिएटर में बंधक जैसी स्थिति पैदा हुई, जिसके बाद उनकी पत्नी की मौत हो गई।
शिकायतकर्ता की मांग है कि अस्पताल में उस समय मौजूद प्रत्येक कर्मचारी की भूमिका, उसकी शैक्षणिक योग्यता, चिकित्सकीय अधिकार और ऑपरेशन से जुड़े लोगों की पहचान की जांच की जाए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अस्पताल में इलाज करने वालों की योग्यता ही संदेह के घेरे में है, तो अब तक इसका सत्यापन क्यों नहीं कराया गया? क्या स्वास्थ्य विभाग और पुलिस ने इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई की है?

अब पुलिस के सामने पांच बड़े सवाल

1. क्या CDR और टावर लोकेशन में सामने आए संदिग्ध नंबरों के धारकों से पूछताछ होगी?
2. क्या सीजेरियन के लिए बुलाए गए दोनों अज्ञात डॉक्टरों की पहचान कर उनकी भूमिका की जांच की जाएगी?
3. क्या अस्पताल कर्मचारियों की मेडिकल योग्यता और डिग्रियों का सत्यापन कराया जाएगा?
4. क्या एंबुलेंस चालक सहित उन सभी लोगों की भूमिका की जांच होगी, जिन पर साक्ष्य छिपाने या मृत शरीर के परिवहन से जुड़े आरोप लगाए गए हैं?
5. क्या जांच में लापरवाही या साक्ष्यों की अनदेखी सामने आने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?

पीड़ित ने गैर इरादतन हत्या, साक्ष्य मिटाने, आपराधिक षड्यंत्र और अन्य संभावित अपराधों के संबंध में भी वैधानिक कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, इन धाराओं में अपराध बनता है या नहीं, यह जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुलिस तथा सक्षम प्राधिकारी को तय करना होगा।
अब आठ सप्ताह की परीक्षा पुलिस की!
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के बाद अष्टभुजा हॉस्पिटल प्रकरण एक बार फिर चर्चा में है। अब रीवा पुलिस अधीक्षक के सामने केवल शिकायत का जवाब देने की नहीं, बल्कि जांच की पारदर्शिता और पीड़ित के सवालों का तथ्यात्मक उत्तर देने की जिम्मेदारी है।

एक तरफ पत्नी को खो चुका श्रवण दिव्यांग पति न्याय के लिए संघर्ष कर रहा है, दूसरी तरफ पुलिस जांच में कथित लापरवाही, संदिग्धों से पूछताछ नहीं होने और महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी के आरोप हैं।
बड़ा सवाल यह है कि क्या रीवा पुलिस आठ सप्ताह के भीतर उन सवालों का जवाब दे पाएगी, जिनका जवाब पीड़ित पिछले ढाई साल से मांग रहा है? क्या इस बार जांच केवल फाइलों में पूरी होगी या वास्तव में जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगी?
NHRC ने शिकायतकर्ता को जांच में शामिल करने और कार्रवाई का परिणाम बताने का निर्देश दे दिया है। अब पुलिस की परीक्षा है। यदि आरोप निराधार हैं तो तथ्यों के साथ स्पष्ट किया जाए और यदि जांच में लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। आखिर न्याय मांगना किसी दिव्यांग पति का गुनाह तो नहीं!

रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी 

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