'जहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है, भारत में वो मंदिर भी हैं'; सबरीमाला पर बड़ी बहस

केरल की पहाड़ियों में बसे भगवान अयप्पा के दरबार से उठा विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर एक ऐसा संवैधानिक भंवर बन गया है, जिसकी लहरें पूरे देश की धार्मिक मान्यताओं को छू रही हैं। सबरीमाला मंदिर में खास उम्र वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ में मैराथन सुनवाई चल रही है। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली इस पीठ के सामने सवाल सिर्फ एक मंदिर का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि क्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता की धाराएँ, सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं के बांध को तोड़ सकती हैं?

वहीं सुनवाई के तीसरे दिन कोर्ट का माहौल तब और दिलचस्प हो गया जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलों का पिटारा खोला। उन्होंने जजों को बताया कि भारत विविधताओं का देश है और यहाँ की परंपराएं किसी एक जेंडर के पक्ष में नहीं झुकी हुई हैं। मेहता ने उदाहरण दिया कि देश में ऐसे कई मंदिर हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है क्योंकि वे मंदिर देवी भगवती के हैं। केरल में ही एक ऐसा मंदिर है जहाँ पुरुष ब्यूटी पार्लर जाकर सजते-धजते हैं और अपनी घर की महिलाओं की मदद से साड़ी पहनकर मंदिर के अंदर जाते हैं। पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर, जहाँ विवाहित पुरुषों के जाने पर रोक है। तुषार मेहता का तर्क साफ था कि यह पुरुषों बनाम महिलाओं की जंग नहीं है, बल्कि यह उस विशेष देवता की प्रकृति और उनसे जुड़ी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं का मामला है। 

वहीं असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कोर्ट के सामने संविधान की वो बारीकियां रखीं, जो इस पूरे केस की जड़ हैं। उन्होंने दलील दी कि अनुच्छेद 25 जहाँ एक व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म को मानने की आज़ादी देता है, वहीं अनुच्छेद 26 किसी धार्मिक संप्रदाय को अपने रीति-रिवाज तय करने का अधिकार देता है। उन्होंने कड़ा तर्क दिया कि जिसकी आस्था नहीं है, उसे अनुच्छेद 26 के तहत मंदिर के प्रबंधन में सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है।

आपको बता दें सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच सबरीमाला विवाद को लेकर सुनवाई कर रही है। मामला 2018 में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले से जुड़ा हुआ। जब कोर्ट ने इस मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी। लेकिन मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश नहीं हो सकता है। यह परंपरा भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ मानने की आस्था से जुड़ी हुई थी। यह मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर स्थित है। यह मंदिर चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा है। यहां आने वाले श्रद्धालु सिर पर पोटली रखकर पहुंचते हैं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो तीन दिनों की इस गरमा-गरम बहस ने यह साफ कर दिया है कि मामला जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं। एक तरफ आधुनिक युग के समानता के अधिकार हैं, तो दूसरी तरफ सदियों से चली आ रही परंपराएं। सॉलिसिटर जनरल ने अपनी बात पूरी कर ली है, अब सबकी निगाहें 14 अप्रैल पर टिकी हैं, जब सुनवाई का चौथा दिन होगा। क्या सुप्रीम कोर्ट परंपराओं की लक्ष्मण रेखा को दोबारा खींचेगा या आधुनिकता की नई परिभाषा लिखेगा? यह देखना वाकई दिलचस्प होगा। 

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