गायत्री शक्तिपीठ में व्यक्तित्व परिष्कार सत्र आयोजित
सहरसा : गायत्री शक्तिपीठ में रविवार को व्यक्तित्व परिष्कार सत्र का आयोजन किया गया।इस सत्र को संबोधित करते हुए डा अरुणकुमार जायसवाल ने मातृत्व दिवस के संबंध में कहा प्रेम किसी के मन में हो सकता है लेकिन मातृत्व जो है वह विरले के मन में होता है। माँ बनना तो एक जैविक घटना है पर मातृत्व का होना एक दैवी घटना है। प्रेम और मातृत्व में बहुत फर्क है। प्रेम पत्नी पति के प्रति करती है। पश्चिम का एक दार्शनिक है, निन्जिसकी, उसने कहा कि नारी का प्रेम कब पूर्ण होता है जब उसको अपने पति में अपनी संतान दिखने लगती है। वह पति का पुत्रवत ख्याल रखती है। ये बात सबसे पहले भारत में कही गई, फिर इस बात को विदेशों में भी लोगों ने कहा। प्रेम जब पूर्ण होता है तो वह पत्नी की जगह माता बन जाती है। पत्नी का पति के प्रति जब संतान भाव आता है तब समझिए कि पत्नी का प्रेम पति के प्रति पूर्ण हो गया। ये संतानवत प्रेम बहुत विरल है बहुत मुश्किल है। 24 घंटे में वह 10, 20 मिनट के लिए पत्नी होती होगी, रिश्ता तभी पूर्ण होता है जब वह दोस्त बनती है और माता बनती है। दोस्त की तरह परिवार में, घर में भय और कलह का वातावरण नहीं वरण घर का वातावरण हल्का फुल्का रखना, माँ की तरह हमेशा त्याग की भावना रखना, उसी तरह पति भी 10, 20 मिनट के लिए पति होता है पर 24 घंटे उसे पिता और गुरु बनना पड़ता है। पिता मतलब पालनकर्ता और गुरु मतलब समाधानकर्ता। घर परिवार में जो आपस में प्रेम, अपनापन, बिना झिझक के, डर के, अपनी बात एक दूसरे से कह सकते हैं, वो संस्कृति अब विलीन हो रही है। उसे फिर से विकसित करने की आवश्यकता है। परिवार में, समाज में सुव्यवस्था नियमों से ही नहीं आती है, प्रेम और ईमानदारी से आती है। प्रेम और ईमानदारी के लिए कोई नियम की आवश्यकता नहीं है वह तो स्वतःस्फूर्त होता है। प्रायः प्रायः क्या देखा जाता है, पत्नी पति से प्रेम तो करती है लेकिन पति को अपने बराबर का अपना समकक्ष मानते हैं। कहीं कहीं तो पति को पत्नी अपना कॉम्पिटिटर यानी प्रतिद्वंदी भी मानती है। लेकिन जब पति के प्रति पत्नी का संतान भाव आ जाता है तो उसकी सेवा, उसकी देखरेख उसका केयर करती है। फिर उलाहना नहीं देती हैं, फिर शिकायत नहीं करती हैं, फिर नाराज नहीं होती है, फिर रूठती नहीं है। फिर वह यह नहीं कहती कि अरे तुमने कब कहा था ये करने के लिए, तुमने मेरा ख्याल नहीं रखा, तुमने जो कहा था वह पूरा नहीं किया। माता और संतान में एक खास बात होती है कि माता को अपने संतान की गलती दिखाई नहीं देती। जब नारी के अंदर मातृभाव आ जाता है तो उसे अपनी पति की गलती दिखाई नहीं देती। अरे कुछ किया होगा छोड़ो जाने दो। तो मूल रूप से स्त्री की सम्पूर्णता संतान में है। वैसे हम लोग कहते है न, जन्म देते वक्त, सिर्फ एक जन्म नहीं होता दो जन्म होता है, एक संतान का और एक मॉ का, माँ का भी जन्म होता है अभी तक वह पुत्री थी बहन थी पत्नी थी अब वह माँ भी हैं। सचमुच संतान से नारी पूर्ण होती है।कहते है त्रियाचरित्रं पुरुषस्य भाग्यम, देवो न जानाति कुतः मनुष्यः, ये संस्कृत का सुभाषित है। लगता है इसमें स्त्री की निंदा है लेकिन इसमें स्त्री की निंदा का भाव नहीं है इसमें भाव है रहस्यमयता का। त्रिया मतलब स्त्री और चरित्र मतलब व्यक्तित्वा नारी के जीवन का अधिकांश भाग रहस्यमय होता है, जो तल पर है उससे अधिक गहरे में होता है। स्त्री का व्यक्तित्व रहस्यमयता को लिए होता है उसी तरह पुरुष का भाग्य भी रहस्यमय होता है। इसे देवगण भी नहीं जान पाते तो मनुष्य कैसे जान पाएगा? त्रिया मतलब स्त्री, पर हर स्त्री त्रिया नहीं होती है। त्रिया का अर्थ है तीनों गुणों की विशेषताओं से संपन्न, मतलब सत रज तम तीनो उसमें हाजिर है। तीन से त्रिया हुआ। कब तमोगुणी बन जाएगी, कब रजोगुणी बन जाएगी और कब सतोगुणी बन जाएगी पता ही नहीं चलता। इसलिए सामान्य लोग कहते हैं स्त्री कब बदल जाएगी, कब न्योछावर हो जाएगी, पता नहीं चलता। एक प्रकार से छलना है, एक रहस्य है, उस रहस्य के परतों को इंसान क्या देवता भी अनावृत नहीं कर पाते। अद्भुत है, स्त्री जब त्रिया का रूप ले लेती है तो अगम्य हो जाती है। उसका पार नहीं पा सकते।सभी स्त्री में कभी कभी त्रिया आ जाती है। सीताजी में त्रिया आ गई तो सीताजी ने लक्ष्मण को बहुत गाली दी, जब रामजी हिरण ढूंढने गए और मारीच ने मन में बोला हे राम और ज़ोर से चिल्लाया हा लक्ष्मण। यह सुनकर लक्ष्मण जी को बहुत गलियायी और यहाँ तक गलियायी कि तुम्हारी नजर मुझ पर है तुम चाहते हो कि राम मर जाए और तुम मुझे हथिया लो। अब ये बात लक्ष्मण के लिए मृत्यु से ज्यादा कष्टकारी थी। जो लक्षमण कभी सीताजी का मुख देखा ही नहीं, जब अपहरण के समय विमान से सीताजी ने आभूषण गिरा दिए थे तो लक्ष्मण ने केवल पांव की पाजेब और बिछवा देखा था वे कहते हैं मैं प्रणाम करता था तो ये चीजे मालूम है बाकी आभूषण को वे नहीं पहचान पाए। ऐसे तपस्वी लक्ष्मण पर भी सीता जी ने आरोप लगा दिया, लेकिन इसके पीछे भी कुछ निहितार्थ है। पूरी बात समझने पर सही सम्यक ज्ञान हो पाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि रामचंद्रजी का संकल्प था रावण का नाश, उनको लीला तो करनी ही थी, अरण्य कांड में सीता जी को राम जी कहते हैं अब मैं लीला करूँगा तुम अग्नि में वास करो, मूल सीता अग्नि में चली गयी और उनका प्रतिरूप बाहर निकल कर आया यानी छाया सीता का अपहरण हुआ। छाया सीता भी उसी तरह रूपवान थी, शीलवान थी, पवित्र थी। यह घटना लक्ष्मण के सामने नहीं घटित हुई थी, लक्ष्मण कंदमूल लाने वन में निकल गए थे। इसलिए यह छाया सीता वाली बात लक्ष्मण जी को नहीं मालूम था। पंचवटी में रावण ने छाया सीता का अपहरण किया था। लक्ष्मण के प्रति यह वक्तव्य छाया सीता का था, न कि मूल सीता का था। तो लीला अलग है, उद्देश्य अलग है। वैसे भी जीवात्मा को संतुष्टि तब होती है जब वह अपने जन्म का उद्देश्य पूरा करता है। जब वह अपने जन्म के उद्देश्य के प्रति आगे बढ़ता है, तभी से संतुष्टि शुरू हो जाती है। तो स्त्री का व्यक्तित्व जितना रहस्यमय होता है उतना ही पुरुष का भाग्य रहस्यमय होता है। जैसे भाग्य को पूरी तरह से जांचा परखा नहीं जा सकता उसी तरह स्त्री का चरित्र भी पूरी तरह जाना नहीं जा सकता। जब लक्ष्मण को पचासों गालियां दीं तो ये तमोगुण हुआ सीता जी मैं, जब राम जी को बहका दी कि जाओ सोने का हिरण मारकर लाओ ये रजोगुण हुआ, जब राम जी की सेवा करती है, उनका ख्याल रखती है, तो उनका यह सतोगुण हुआ। त्रिया चरित्र का दूसरा उदाहरण राजा विक्रमादित्य की पत्नी रानी पिंगला, इतने यशस्वी, वीर, प्रतिभावान, भावना शील राजा विक्रमादित्य पिंगला को पहचान नहीं पाए।
रिपोर्टर : अजय कुमार
No Previous Comments found.