सतमत सत्संग मंदिर में सप्त दिवसीय सत्संग भजन-कीर्तन आयोजित

सहरसा : शहर के गांधी पथ स्थित संतमत सत्संग मंदिर मे दिनांक 6 मार्च से सात दिवसीय संतमत सत्संग का कार्यक्रम चल रहा है जिसका समापन 12 मार्च को किया जाएगा।बुधवार को आयोजित सत्संग में भागलपुर से आए हुए प्रवचनकर्ता स्वामी भगवतानंद जी महराज ने उपस्थित धर्मलाबियो से कहा कि धर्म ही वह आश्रय है, जिसके माध्यम से जन्म जरा से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।धर्म ही आत्मा का रक्षक है। सांसारिक माया-मोह में उलझे व्यक्ति को जन्म-जरा का बंधन भी बंधन प्रतीत नहीं होता। वह तो केवल भौतिक सुख-संपदा को पाकर ही प्रसन्न होता रहता है।आत्मकल्याण की सुधि उसे कहां रहती है।किन्तु जागृत आत्मा सांसारिक जीवन-यापन करते हुए भी उस संसाररूपी जन्म- के पिंजड़े से मुक्ति के लिए हर पल पुरुषार्थरत रहती है।यह संसार एक ऐसा सागर है, जिसकी जलधारा में प्राणी न तैर पा रहा है और न डूब पाता है। प्रत्येक धर्मशास्त्र यही संदेश देता है कि यदि कोई आश्रम का ठौर है,तो वह है धर्म। धर्म ही वह आश्रय है, जिसके माध्यम से जन्म-जरा से मुक्ति पायी जा सकती है। धर्म ही आत्मा का रक्षक है, जिसके माध्यम से आत्मा के विकास में गति प्राप्त होकर सही अर्थों में कर्मों के दुश्चक्रों की सफाई होती है। उन्होंने कहा है कि दीप पर्व की तैयारियाँ हम बाहरी सफाई एवं रंग-रोगन कर अनादि काल से करते चले आये है। किन्तु बाहरी सफाई के साथ-साथ अंतर में व्याप्त क्रोध, मन-माया, लोभ के कचरे की सफाई भी आत्म-कल्याण के लिए अनिवार्य है। जप, तप और ध्यान क्रिया से जुड़कर कर्मों की निर्जरा से ही भव- परम्परा से मुक्ति संभव है। भगवान की वाणी को आत्मसात कर मानव से महामानव बनकर हम सभी अपने जीवन को उज्ज्वल बनायें।स्वामी नवलकिशोरनंद जी महराज ने प्रवचन करते हुए कहा अभ्यास के आरंभ में गुरु-रूप का ध्यान होना चाहिए अथवा तिल पर सुरत जमाना चाहिए। इसके लिए जानना चाहिए कि गुरु-रूप का ध्यान स्थूल और मानस ध्यान है और तिल पर सुरत जमाने का ध्यान सूक्ष्म है और मन से विंदु या तिल बनाकर देखना नहीं है। अभ्यास के आरंभ में स्थूल से ही आरंभ करना स्वभावानुकूल है। इससे दृष्टि और मन का सिमटाव स्थूल मूर्ति को मनोमय बनाकर मन और दृष्टि को उस पर रखने से मन और दृष्टि का जितना सिमटाव होता है।उसे तिल या बिंदु वा सूक्ष्म ध्यान के आरंभिक अभ्यास करने की योग्यता अभ्यासी को होती है। इसलिए अभ्यास के आरंभ में गुरु-रुप का स्थूल ध्यान कहा गया है और सूक्ष्म ध्यान के आरंभ के लिए तिल वा बिंदु-ध्यान कहा गया है।स्वामी महेशानंद जी महराज ने बताया कि इस संतमत सत्संग के आयोजन के दौरान ध्यान-साधना शिविर में प्रतिदिन एक -एक घंटा का सामूहिक ध्यानभ्यास दिन मे पांच बार ,तीनो पहर सत्संग-प्रवचन एवं भजन कीर्तन हो रहा है।12 मार्च को समापन के दिन स्वामी रामलग्न जी महाराज का प्रवचन होगा।

रिपोर्टर : अजय कुमार

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