गायत्री शक्तिपीठ में नारी तेरे कितने रूप विषय पर परिचर्चा आयोजित

सहरसा : गायत्री शक्तिपीठ में व्यक्तित्व परिष्कार सत्र का आयोजन रविवार को किया गया।सत्र को संबोधित करते हुए डा अरुण कुमार जायसवाल ने नारी  कितने रूप  के संबंध मे बताते हुए कहा प्रेम किसी के मन में हो सकता है। लेकिन मातृत्व जो है वह विरले के मन में होता है। माँ बनना तो एक जैविक घटना है पर मातृत्व का होना एक दैवी घटना है।प्रेम और मातृत्व में बहुत फर्क है।प्रेम पत्नी पति के प्रति करती है।स्त्री में प्रेम के संबंध में दो गुण होते हैं, पहला वो सामनेवाले तक अपने प्रेम को आसानी से संप्रेषित कर देती है, वह मौन सम्प्रेषण होता है, दूसरा प्रेम के लिए उसके अंदर प्रतीक्षा का धैर्य बहुत होता है।जितनी प्रतीक्षा स्त्री कर सकती है उतनी प्रतीक्षा कोई नहीं कर सकता। स्त्री प्रतीक्षा करती है अपने प्रेमी की। ये स्त्रियां ही कर सकती है, पुरुष नहीं कर सकता।अपने भारत में स्त्री के व्यक्तित्व का अध्ययन, बहुत गूढता और गंभीरता से किया गया है। अपने हिंदुस्तान में स्त्री का विधवा होना, विधवा तो बाहर के देशों में भी होती है, लेकिन अपने यहाँ विधवा होकर जो साध्वी का जीवन जीती है, वैसा किसी अन्य देश में प्रक्रिया परंपरा है ही नहीं। विधवा स्त्री तपस्विनी और साध्वी का स्वरूप ग्रहण करती है। हालांकि अब ये प्रक्रिया कमजोर पड़ गई है। वैधव्य की अपनी मर्यादा है और सबसे खूबसूरत बात है कि वह पति को परमेश्वर में और परमेश्वर को पति में विलीन कर जीती है। जैसे माँ के रूप में परमात्मा की कल्पना दुनिया में कहीं नहीं है, वैसे अपने यहाँ तपस्वी और साध्वी होकर वैधव्य जीवन व्यतीत करने की जो प्राचीन परंपरा है वैसा कहीं नहीं है।स्त्री में सामर्थ्य है वह तपस्विनी और साध्वी दोनों बनकर रह सकती है। पुरुष में सामर्थ्य ही नहीं है कि वह यह काम कर सके। स्त्री को प्रेम करना आता है जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी, ये बहुत अद्भुत है।संसार में भौतिक था और आध्यात्मिकता बस का समन्वय नहीं होता, आध्यात्मिक जीवन दृष्टि के साथ भौतिक कुशलतायें विकसित नहीं होती, तब तक संसार इसी तरह युद्ध के नरक में झुलसता रहेगा। आध्यात्मिक जीवन दृष्टि के अनुसार बुद्धि शक्ति और सामर्थ्य विकसित नहीं होती, तब तक ईरान और अमेरिका आदि की घटनाएं घटती रहेंगी इतिहास में ऐसा कई बार हो चुका है और आगे भी होता रहेगा। अब रही बात भगवान की, वे अमेरिका को सद्बु‌द्धि दें। तो भगवान के बारे में समझने की कोशिश करें वह हम सभी के कर्मों का नित्य साक्षी है। भगवान कभी कुछ नहीं करता। सद्बु‌द्धि आपको देता है।

रिपोर्टर : अजय कुमार

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