रोजा से धैर्य और आत्मसंयम का होता है विकास : डॉ लुत्फुल्लाह

सहरसा : रोजा न केवल आत्मसंयम और धैर्य की परीक्षा है,बल्कि यह अल्लाह से निकटता प्राप्त मार्ग है.कुरआन में कहा गया है अल्लाजीना इंडलिल्लाहे  इस्लाम,अर्थात अल्लाह के निकट एकमात्र स्वीकार्य धर्म इस्लाम है. इतिहास गवाह है कि प्रारंभ से ही विभिन्न धर्मों में रोजा को महत्व दिया गया है. रोजा रखने से इंसान में तकवा (धैर्य) और परहेजगारी (संयम) विकसित होता है.जब व्यक्ति भूख और प्यास सहन करता है, तो उसे उन लोगों की पीड़ा का एहसास होता है,जो अभाव में जी रहे रहे हैं.इससे दयालुता और सहानुभूति की भावना उत्पन्न होती है. आधुनिक मेडिकल साइंस भी इस बात की पुष्टि करता है कि रोजा रखने से स्वास्थ्य बेहतर होता है.उपवास के दौरान शरीर को विषाक्त पदार्थों से मुक्त होने का अवसर मिलता है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है और मानसिक स्थिरता बढ़ती है. इस्लाम में जकात एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यवस्था है,जो गरीबी को दूर करने व समाज में आर्थिक संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है. प्रत्येक सक्षम व्यक्ति अपनी आमदनी का ढाई प्रतिशत गरीबों को दान करता है. कुरआन में जहां-जहां नमाज का उल्लेख किया गया है,वहीं जकात,और फितरा देने की भी बात कही गयी है।

रमजान उल मुबारक का आखिरी अशरफ चल रहा है हाय हम सभी मिलकर अल्लाह पाक से दुआ फरमाए सभी की मग़फ़िरत, फरमाए सेहतमंद बख्श दे आग से खलासी एवं सभी की जिंदगी में रहमत बरकत खुशहाली,तरक्की हो अल्लाह पाक से सभी के लिये दुआ करता है।

रिपोर्टर : अजय कुमार

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