जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम एवं पॉक्सो अधिनियम पर एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण
सहरसा : कोशी प्रमंडल में बाल संरक्षण को सुदृढ़ बनाने एवं कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के उद्देश्य से पुलिस पदाधिकारियों एवं कर्मियों के लिए जुवेनाइल जस्टिस (बाल न्याय) अधिनियम एवं पॉक्सो अधिनियम पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन सोमवार को विकास भवन सभागार में आयोजित हुई।यह प्रशिक्षण कार्यक्रम कवच, यूनिसेफ एवं बिहार पुलिस के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया।प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहरसा, सुपौल एवं मधेपुरा जिलों के थाना प्रभारी एवं बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।इस प्रशिक्षण में प्रशिक्षक भगवान जी पाठक एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीश चन्द्रमा सिंह द्वारा प्रतिभागियों को कानून के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई। जिससे वे अपने दायित्वों का प्रभावी निर्वहन कर सकें।इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य पुलिस अधिकारियों को बाल अधिकारों, बाल संरक्षण से जुड़े प्रावधानों, तथा बच्चों से संबंधित मामलों में संवेदनशील एवं विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करने हेतु सक्षम बनाना है। प्रशिक्षण के दौरान जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान एवं महत्वपूर्ण धाराएं,पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की पहचान, महत्वपूर्ण धाराएं एवं जांच प्रक्रिया बाल पीड़ितों के साथ संवेदनशील व्यवहार एवं बाल अनुकूल प्रक्रियाप्राथमिकी दर्ज करने, साक्ष्य संकलन एवं अभियोजन की प्रक्रिया,केस स्टडी एवं व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझ विकसित करने हेतु प्रशिक्षण दिया गया।इस पहल से सहरसा प्रमंडल में बाल सुरक्षा तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की अपेक्षा है। प्रशिक्षक भगवान जी पाठक ने कहा कि पुलिस पदाधिकारी को संवेदनशील होना होगा क्योंकि किशोर न्याय अधिनियम कहता है। बच्चा निर्दोष है ।किसी बच्चों को दाग संबंधी बात नहीं हो कोई बच्चा फंसे नहीं इसे ध्यान में रखकर किशोर न्याय अधिनियम 2015 एवं लैंगिक अपराध अधिनियम 2012 के संशोधित अधिनियम पर पुलिस थाना अध्यक्ष एवं बाल कल्याण पदाधिकारी को ध्यान देने की आवश्यकता है।वही सेवानिवृत न्यायाधीश चंद्रमा सिंह ने कहा कि पॉक्सो एक्ट मामले में पुलिस अफसर की क्या भूमिका होनी चाहिए।कैसे अनुसंधान बढ़ाना है। पोक्सो एक्ट में तुरत एफआईआर दर्ज कर लेना है और 24 घंटे के अंदर हर परिस्थिति में मुजरिम की गिरफ्तारी हो जानी चाहिए। साथ ही एक महीने में अनुसंधान अवश्य पूरा होना चाहिए। वहीं न्यायालय को भी एक साल में ट्रायल समाप्त कर सजा देने का प्रावधान है। क्योंकि यह अपराध जघन्य से जघन्य अपराध माना गया है ।2019 के संशोधन के अनुसार इसमें सजा ए मौत का प्रावधान किया गया है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में तीनों जिलों थानाध्यक्ष एवं पुलिस बाल कल्याण पदाधिकारी शामिल रहें।
रिपोर्टर : अजय कुमार

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