नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्फूर्ति और सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है : कुन्दन वर्मा

सहरसा : विश्व नृत्य दिवस के अवसर पर शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान के नाट्य प्रशिक्षक, अभिनेता सह निर्देशक कुंदन वर्मा से हुए साक्षात्कार में कहा कि नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, यह आत्म-अभिव्यक्ति, संस्कृति, परंपरा और भावनाओं को दर्शाने का एक माध्यम है। यह शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्फूर्ति और सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी कई नृत्य रूप ईश्वर की आराधना से जुड़े होते हैं।नृत्य की उत्पत्ति प्राचीन काल से मानी जाती है। भारतीय शास्त्रों में "नाट्य शास्त्र" (भरतमुनि द्वारा रचित) को नृत्य का सबसे पुराना ग्रंथ माना जाता है। इसमें भरत मुनि ने नृत्य को ‘नाट्य’ का एक अनिवार्य अंग बताया है। भारतीय संस्कृति में नृत्य की शुरुआत देवताओं से जोड़ी जाती है।त्रेतायुग में देवताओं की विनती पर ब्रह्माजी ने नृत्य वेद तैयार किया, तभी से नृत्य की उत्पत्ति संसार में मानी जाती है।जैसे कि शिव का तांडव और विष्णु की मोहिनी रूप।नृत्य एक सशक्त अभिव्यक्ति है जो पृथ्वी और आकाश से संवाद करती है। हमारी खुशी हमारे भय और हमारी आकांक्षाओं को व्यक्त करती है।मैथिली संस्कृति में नृत्य का विशेष स्थान है। यहाँ पारंपरिक लोकनृत्य और आधुनिक नृत्य शैलियाँ दोनों ही प्रचलित हैं।

झिझिया नृत्य : यह विशेष रूप से दुर्गा पूजा के अवसर पर महिलाएं करती हैं, जिसमें सिर पर घड़ा रखकर दीप जलाकर नृत्य होता है।
सामा-चकेवा नृत्य : यह भाई-बहन के प्रेम पर आधारित एक लोक पर्व के दौरान किया जाने वाला नृत्य है।
जट-जटिन नृत्य : यह पारंपरिक नाटकीय नृत्य है, जो पति-पत्नी के बीच के प्रेम, तकरार और सामाजिक जीवन को दर्शाता है। यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में किया जाता है, जहाँ महिला पात्र "जटिन" और पुरुष "जट" की भूमिका निभाते हैं।
विदापत नृत्य : यह महाकवि विद्यापति के गीतों पर आधारित होता है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की झलक होती है।
आजकल मैथिली गीतों पर आधारित आधुनिक नृत्य भी लोकप्रिय हो रहे हैं, जो मंचीय प्रदर्शन, सोशल मीडिया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देखे जाते हैं। इनमें पारंपरिक भाव-भंगिमाओं को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ा जाता है। उन्होंने कहा कि विगत दो दशकों से कला, कलाकार, संस्कृति व साहित्य को समेटे कोशी की अग्रणी सांस्कृतिक संस्था शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान ने भी शास्त्रीय व लोक नृत्य को प्राथमिकता देकर उसे समृद्ध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया है।

रिपोर्टर : अजय कुमार

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