भारत के लोकतंत्र में एक ही चेहरे को बार-बार मौका क्यों मिलता है?

साहित्य : लोकतंत्र का मतलब केवल हर पाँच साल में चुनाव कराना या मतपेटी में वोट डाल देना नहीं है। लोकतंत्र का असली सार है – विकल्पों की भरमार, विचारों की विविधता, नीतियों में नवाचार और नेतृत्व में निरंतर नवीकरण। भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े और सबसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर एक ही चेहरों को, एक ही परिवारों को या एक ही पुराने नेताओं को बार-बार सत्ता का मौका क्यों दिया जाता है? जबकि नई पीढ़ी, नए विचार और नए दृष्टिकोण वाले नेताओं को भी बराबर का अवसर मिलना चाहिए। यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की सेहत, उसकी जीवंतता और जनभावनाओं के बदलते स्वरूप से जुड़ा गहरा सवाल है।भारत के लोकतांत्रिक इतिहास को देखें तो कई बार एक ही चेहरा या एक ही नेतृत्व दशकों तक सत्ता के केंद्र में बना रहता है। इसके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नए नेतृत्व को आगे आने का समान अवसर नहीं मिलना चाहिए? मेरा स्पष्ट मत है – बिल्कुल मिलना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ लोकतंत्र की यही पहचान है कि वह खुद को समय के साथ नवीनीकृत करता रहे।एक ही चेहरे को बार-बार मौका मिलने के प्रमुख कारणजनता की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा और “परिचित बेहतर है” का सिद्धांत भारतीय मतदाता आम तौर पर उसी नेता को दोबारा चुनना पसंद करता है जिसे वह वर्षों से जानता-पहचानता है। परिचित चेहरा उसे सुरक्षा, स्थिरता और निरंतरता का एहसास कराता है – भले ही वह नेता पिछले कार्यकाल में पूरी तरह सफल न रहा हो। नया चेहरा आने पर लोगों के मन में अनिश्चितता और जोखिम का डर बैठ जाता है। “कहीं नया प्रयोग गलत न साबित हो जाए” – यही भय पुराने नेताओं को बार-बार जिताता है।

राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की भयंकर कमी
भारत की अधिकांश बड़ी पार्टियाँ आज भी परिवारवाद, चाटुकारिता, गुटबाजी और वरिष्ठ नेताओं के वर्चस्व से ग्रस्त हैं। टिकट वितरण से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री चुनने तक की प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्यता का नहीं, वफादारी और रिश्ते-नाते का बोलबाला है। नतीजा यह होता है कि नए, युवा और स्वतंत्र सोच वाले नेता दबकर रह जाते हैं। जब पार्टी के भीतर ही नए चेहरों को जगह नहीं मिलती, तो जनता के सामने भी वही पुराने चेहरे बार-बार परोसे जाते हैं।
चुनावी संसाधनों और प्रचार-तंत्र की भयानक असमानता
सत्ता में रहते हुए नेता के पास सरकारी मशीनरी, अकूत धन, मीडिया तक पहुंच और विशाल कार्यकर्ता नेटवर्क होता है। वहीं नए उम्मीदवार के पास न धन होता है, न इतना संगठन, न ही मीडिया में उतनी जगह। नतीजतन चुनावी मैदान में एक तरफ़ा खेल दिखाई देता है। पुराना चेहरा हर तरफ़ चमकता रहता है, नया चेहरा जनता की नज़रों से ओझल रह जाता है।
करिश्माई व्यक्तित्व की गहरी जड़ें
भारत में मुद्दों और नीतियों से ज्यादा व्यक्तित्व की राजनीति हावी रही है। एक बार कोई नेता जनता के दिलों में “मसीहा” बन जाता है तो उसका जादू दशकों तक चलता रहता है – चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी बदल जाएँ। नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, क्षेत्रीय स्तर पर मुलायम सिंह, करुणानिधि, पटनायक, ममता, नीतीश – सबके साथ यही हुआ। व्यक्तित्व पूजा ने विचारधारा और नीति को पीछे धकेल दिया है।
क्षेत्रीय स्थिरता और निरंतरता की जन-इच्छा
कई राज्यों में जनता बार-बार एक ही नेता को इसलिए चुनती है क्योंकि वह अपने क्षेत्र में एकसमान नीतियाँ, योजनाएँ और स्थानीय विकास चाहती है। बार-बार नेतृत्व बदलने से अधूरे प्रोजेक्ट, नई प्राथमिकताएँ और प्रशासनिक अस्थिरता का डर रहता है। इस स्थिरता की चाह भी पुराने नेताओं को लाभ पहुँचाती है।
राजनीतिक जागरूकता और सूचना तक पहुंच का असंतुलन
शहरों के शिक्षित मतदाता नए विकल्पों पर विचार कर सकते हैं, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आज भी वही पुराना चेहरा, वही जातीय-क्षेत्रीय समीकरण और वही पुरानी वफादारी हावी रहती है। डिजिटल विभाजन और मीडिया की एकतरफा कवरेज भी नए चेहरों को जनता तक पहुँचने से रोकती है। नए चेहरों को मौका मिलना क्यों जरूरी है?लोकतंत्र तभी जीवंत और मजबूत रहता है जब उसमें नया रक्त संचार होता रहे।  नए विचार, नई ऊर्जा और नई पीढ़ी के दृष्टिकोण सामने आएँ  

समाज की बदलती जरूरतों (जैसे डिजिटल अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, युवा बेरोजगारी) के अनुरूप नीतियाँ बनें  
पुराने नेताओं को स्वस्थ चुनौती मिले, जिससे वे भी वे बेहतर प्रदर्शन करें  
सत्ता का स्वाभाविक चक्र चले, अन्यथा लोकतंत्र एक प्रकार के “एकाधिकार” में बदल जाता है  
युवा और महिलाएँ मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हों, जिससे समाज का हर वर्ग प्रतिनिधित्व पाए

यदि एक ही चेहरा या एक ही परिवार दशकों तक सत्ता पर काबिज रहे तो लोकतंत्र धीरे-धीरे विचारहीन, नेतृत्वहीन और जवाबदेही से दूर होता चला जाता है।नए चेहरे कैसे सामने आएँ? – कुछ व्यावहारिक उपायराजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए
टिकट वितरण, प्रदेश अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक के चुनाव पारदर्शी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हों।
युवाओं व महिलाओं के लिए आरक्षण व प्राथमिकता
कम-से-कम 33-50% टिकट नए चेहरों व महिलाओं को दिए जाएँ। कई पार्टियाँ यह प्रयोग कर भी रही हैं।
चुनावी खर्च व विज्ञापन पर सख्त सीमा व निगरानी
ताकि धन और मशीनरी का खेल कम हो और योग्यता व विचार आगे आएँ।
मतदाता शिक्षा और जागरूकता अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जाए
स्कूल-कॉलेज से लेकर ग्राम पंचायत तक नए विकल्पों की जानकारी पहुँचाई जाए।
मीडिया की संतुलित भूमिका
सिर्फ़ सत्ता पक्ष या लोकप्रिय चेहरों को ही नहीं, नए व योग्य उम्मीदवारों को भी समान कवरेज व मंच मिले।
नए नेताओं के लिए मेंटरशिप व ट्रेनिंग प्रोग्राम
पार्टियाँ और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर युवाओं को चुनावी राजनीति की बारीकियाँ सिखाएँ।

भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और सबसे जीवंत लोकतंत्र है। लेकिन इसकी यह जीवंतता तभी बनी रहेगी जब इसमें पुराने और नए दोनों तरह के चेहरों को समान अवसर और सम्मान मिले। केवल पुराने चेहरों पर निर्भर रहना लोकतंत्र को स्थिर तो रख सकता है, पर उसे नवाचारी, ऊर्जावान और भविष्य के लिए तैयार नहीं रख सकता।आने वाला भारत युवा भारत है। डिजिटल भारत है। महत्वाकांक्षी भारत है।
इस भारत को नेतृत्व भी नया, साहसी और दूरदर्शी चाहिए।
लोकतंत्र की असली खूबसूरती बदलाव में है।
और बदलाव तभी संभव है जब हम सब – जनता, मीडिया और राजनीतिक दल – मिलकर नए चेहरों को मौका दें, विश्वास करें और आगे बढ़ने का रास्ता बनाएँ।जय हिंद!

रिपोर्टर : चंद्रकांत  पूजारी
 

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