शहर कभी सोता नहीं… यह बात उसने कई बार सुनी थी, पर महसूस आज पहली बार कर रही थी
साहित्य : शहर कभी सोता नहीं… यह बात उसने कई बार सुनी थी, पर महसूस आज पहली बार कर रही थी। ऊँची-ऊँची इमारतों से घिरा यह शहर उसे हमेशा चमकता हुआ लगता था—जैसे किसी ने काँच के हजारों टुकड़े जोड़कर एक सपना बना दिया हो। लेकिन उस सपने में रहने वाले लोग… शायद काँच से भी ज्यादा नाजुक थे।
रिया उस शहर में नई थी।
एक छोटे से कस्बे से आई थी—जहाँ लोग नाम से नहीं, रिश्तों से पहचाने जाते थे। जहाँ सुबह की चाय पड़ोस के बरामदे में और शाम की बातें छत पर होती थीं। पर यहाँ… यहाँ लोग लिफ्ट में साथ खड़े होकर भी अजनबी रहते थे।
रिया ने अपनी नौकरी के पहले दिन ऑफिस की खिड़की से बाहर झाँका। नीचे सड़कों पर गाड़ियों की लंबी कतार थी। हर कोई कहीं भाग रहा था… जैसे देर हो रही हो, पर किसी को पता नहीं किस चीज़ के लिए।
उसने अपने मोबाइल की स्क्रीन खोली।
कोई नया मैसेज नहीं।
माँ रोज सुबह कॉल करती थीं, पर आज शायद गाँव में बिजली नहीं होगी। या शायद… माँ ने सोचा होगा कि बेटी अब बड़े शहर में है, व्यस्त होगी।
रिया ने गहरी साँस ली और खुद से कहा—
“यही तो चाहा था… अपने सपनों का शहर।”
पर सपनों में इतना सन्नाटा नहीं होता।
ऑफिस में सब अच्छे थे… पर बस औपचारिक।
“हाय…”
“गुड मॉर्निंग…”
“मेल चेक कर लिया?”
बस इतना ही। किसी को किसी की कहानी जानने की फुर्सत नहीं थी।
एक दिन लंच ब्रेक में वह अकेली कैफेटेरिया के कोने में बैठी थी। सामने की टेबल पर लोग हँस रहे थे… जोर-जोर से बातें कर रहे थे। पर उसे ऐसा लग रहा था जैसे उनकी आवाजें काँच के पार से आ रही हों।
उसी समय एक हल्की आवाज आई—
“यहाँ बैठ सकता हूँ?”
रिया ने सिर उठाया। एक दुबला-पतला लड़का, हाथ में कॉफी का कप। चेहरे पर थकी हुई मुस्कान।
“हाँ… बैठिए।”
उसका नाम आरव था।
वह भी इस शहर में नया था।
और… वह भी अकेला था।
धीरे-धीरे दोनों साथ लंच करने लगे। बातों में ज्यादा कुछ खास नहीं होता था—ऑफिस, ट्रैफिक, मौसम… पर उन छोटी-छोटी बातों में एक सुकून था।
एक दिन रिया ने पूछा,
“तुम यहाँ क्यों आए?”
आरव कुछ देर चुप रहा। फिर बोला—
“क्योंकि घर में सबको लगता था कि मैं कुछ बड़ा कर सकता हूँ… और मुझे लगा, शायद यहाँ आकर खुद को ढूँढ लूँगा।”
“मिला?” रिया ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
आरव ने कॉफी की सतह को देखते हुए कहा—
“नहीं… पर खुद को खोना जरूर आसान हो गया।”
रिया चुप हो गई।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके मन की बात कह दी हो।
दिन बीतते गए।
शहर अब भी वही था—भागता हुआ, चमकता हुआ… पर रिया के लिए थोड़ा कम अजनबी हो गया था। क्योंकि अब उसके पास कोई था… जो उसकी चुप्पी को भी सुन लेता था।
एक शाम ऑफिस से लौटते हुए तेज बारिश शुरू हो गई। सड़क पर लोग भागने लगे। रिया बस स्टॉप के नीचे खड़ी थी… भीगी हवा चेहरे को छू रही थी।
आरव भी वहीं आ गया।
दोनों चुपचाप बारिश देखते रहे।
“तुम्हें घर की याद आती है?” आरव ने पूछा।
रिया की आँखें भर आईं।
“हर रात।”
कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा—
“माँ की आवाज… पापा का अखबार पढ़ते हुए खाँसना… बरामदे की वो पुरानी कुर्सी… सब याद आता है।”
आरव ने बस इतना कहा—
“मुझे भी।”
उस दिन पहली बार दोनों ने महसूस किया—अकेलापन बाँटने से थोड़ा हल्का हो जाता है।
लेकिन शहर की रफ्तार रिश्तों से तेज होती है।
कुछ महीनों बाद आरव को दूसरी कंपनी से ऑफर मिला—दूसरे शहर में। बेहतर सैलरी… बड़ा मौका।
रिया ने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हें जाना चाहिए… यही तो सपना था।”
पर उसके भीतर कुछ टूटकर धीरे से बिखर गया।
आरव ने पूछा—
“अगर मैं चला गया… तो तुम ठीक रहोगी?”
रिया ने जवाब दिया—
“हम सब ठीक रहना सीख ही जाते हैं।”
उसके जाने के बाद शहर फिर पहले जैसा हो गया।
ऑफिस वही… सड़कें वही… लिफ्ट वही…
पर अब लंच टेबल खाली थी।
मोबाइल अब भी अक्सर खामोश रहता था।
माँ का कॉल आता… वह हँसकर बातें करती… पर फोन रखते ही कमरा फिर उतना ही चुप हो जाता।
एक रात उसने आईने में खुद को देखा।
वही चेहरा… वही आँखें…
पर उनमें अब एक थकान थी।
उसे लगा—इस शहर ने उसे मजबूत तो बना दिया… पर थोड़ा ठंडा भी।
कुछ दिन बाद ऑफिस में एक नई लड़की आई—मीरा।
पहले दिन वह कैफेटेरिया में अकेली बैठी थी… बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी रिया बैठा करती थी।
रिया उसके पास गई।
“यहाँ बैठ सकती हूँ?”
मीरा ने सिर उठाया… हल्की मुस्कान।
“हाँ… बैठिए।”
रिया ने महसूस किया—कहानी दोहराई जा रही है।
उस दिन घर लौटते हुए रिया ने आसमान की ओर देखा। शहर की रोशनी में तारे कम दिखते थे… पर जो दिखते थे, वे ज्यादा चमकते थे।
उसे अचानक समझ आया—
शहर दिल नहीं छीनता… बस उन्हें अलग-अलग कमरों में रख देता है।
और कभी-कभी… कोई दरवाजा खटखटा देता है।
उसने माँ को कॉल किया।
लंबी बात की।
फिर खुद के लिए चाय बनाई… और खिड़की के पास बैठ गई।
नीचे शहर अब भी भाग रहा था।
पर आज उसे लगा… वह इस भागती दुनिया का हिस्सा है, खोई हुई नहीं।
उसने धीरे से मुस्कुराकर सोचा—
“शायद जीवन यही है…
लोग आते हैं, जाते हैं…
पर हर मुलाकात हमें थोड़ा और इंसान बना जाती है।”
शीशे के शहर में रहते-रहते…
उसका दिल अब भी धड़क रहा था।
और यही सबसे बड़ी जीत थी।
अगर आप चाहें तो मैं इस कहानी का दूसरा भाग, ऑडियो नैरेशन, या इसे और ज्यादा भावनात्मक/रोमांचक बना सकता हूँ।
रिपोर्टर : चंद्रकांत पुजारी


No Previous Comments found.