बिना युद्ध के भी वर्षों से युद्ध जैसी स्थिति, पेट्रोल-डीजल के टैक्स में सरकार की कुनिति

साहित्य : * भाव कम बढ़े क्योंकि आपने पहले से ही बढ़ाकर रखे थे।

* ₹1 लाख करोड़ छोड़ दिए, तो पिछले दशक में कितने लाख करोड़ कमाए?
* बिना युद्ध के भी देश में युद्ध जैसी टैक्स व्यवस्था लागू रही।
* हर तरह से आय बढ़ाई, फिर भी सरकारी कर्ज लगातार क्यों बढ़ा?
* जिस पेट्रोल-डीजल को हम दूसरे देशों को बेचते हैं, वह वहां सस्ता और अपने लोगों को महंगा क्यों?
* पिछले दशक से पेट्रोल-डीजल के टैक्स में "खोदा पहाड़, निकला खजाना सरकार का" जैसी नीति।

मित्रों, आज कदम-कदम पर पेट्रोल, डीजल और गैस के बढ़ते दामों का बोझ आम जनता उठा रही है। इसके पीछे अक्सर युद्ध, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां और वैश्विक संकटों का हवाला दिया जाता है। वहीं सरकार और उसका समर्थन करने वाला बड़ा मीडिया वर्ग भी इस नीति को सही ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
लेकिन कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब खुद सरकार के आंकड़े ही दे देते हैं। ले लेकिन पहले सरल भाषा में यह समझ लो के कोई भी चीज के दाम उसके मूल भाव + खर्च + मजूरी+ प्रॉफिट + टैक्स होकर पाया जाता हे। और पेट्रोल डीजल के भाव में सरकार ने टैक्स ही ऐसा लगा रखा हे कि युद्ध की स्थिति में भाव बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी लेकिन अपना मुनाफा यानी कि टेक्स कम करते गए। आज यह हम विस्तार से जानेंगे।हाल ही में वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने कहा कि केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती करके लगभग ₹1 लाख करोड़ की आय का त्याग किया और जनता को राहत दी। सरकार इसे एक बड़ी आर्थिक सहायता के रूप में प्रस्तुत करती है।
लेकिन वास्तविकता यह भी है कि जब कच्चे तेल (Crude Oil) के अंतरराष्ट्रीय भाव ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर थे, तब जनता को ₹55–60 प्रति लीटर के आसपास पेट्रोल-डीजल मिलना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय भारी कर वसूले गए और हजारों-लाखों करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय सरकार के खजाने में गई। ऐसे में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आखिर यह पैसा कहां गया और किसके हित में उपयोग हुआ?
यदि पिछले दशक के आंकड़ों को निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो एक बड़ा प्रश्न सामने आता है — क्या सरकार द्वारा बताई जाने वाली यह "राहत" वास्तव में उतनी बड़ी है जितनी दिखाई जाती है, या फिर यह उसी जनता के पैसे का एक छोटा हिस्सा है जिससे वर्षों तक असाधारण कर वसूला गया?
भारत में पेट्रोल और डीजल केवल ईंधन नहीं हैं। वे देश की पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। ट्रक, बसें, कृषि पंप, टैक्सी, ऑटो, उद्योग, डिलीवरी नेटवर्क और खाद्य पदार्थों का परिवहन — सब कुछ इन पर निर्भर है। इसलिए ईंधन महंगा होता है तो लगभग हर वस्तु महंगी हो जाती है।

भारत और पड़ोसी देशों में कर का तुलनात्मक बोझ
ए आई की मदद से हमे यह जानना हो कि किस देश की सरकार ने पेट्रोल-डीजल के मूल्य में कितना कर जोड़ा, तो पंप मूल्य में करों की हिस्सेदारी देखनी होगी।2015 से 2025 तक के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार पेट्रोल-डीजल के खुदरा मूल्य में करों की हिस्सेदारी निम्न प्रकार रही:
जहां हमारे पड़ोसी देश जो हमसे ईंधन खरीदते हे। वह वहां के लोगों को टैक्स कम लेकर हमारे देश से भी कम दामों में पेट्रोल डीजल अपने नागरिकों को दे रहे हे जो इस तालिका से स्पष्ट दिखाई देता है और वर्ष 2015 से 2025 तक भारत में पेट्रोल-डीजल पर करों का भार पड़ोसी देशों की तुलना में लगातार अधिक रहा है।कुछ देश ऐसे भी हैं जो भारत से पेट्रोलियम उत्पाद खरीदते हैं, फिर भी वहां करों की हिस्सेदारी भारत से कम दिखाई देती है।यह भी साफ दिखता है कि आज यदि कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े हैं, तो उसका एक कारण यह है कि उन्होंने हाल के वर्षों में कर बढ़ाए हैं। जबकि भारत में जिस स्तर का कर आज अन्य देश लगाने लगे हैं, उस स्तर का कर भारत की जनता वर्षों से चुकाती आ रही है। पाकिस्तान, श्रीलंका और भूटान जैसे देशों में भी पिछले दशक के दौरान करों की हिस्सेदारी भारत से कम रही है।सबसे महत्वपूर्ण वर्ष 2020 था। कोरोना महामारी के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ऐतिहासिक रूप से गिर गए थे। कुछ समय के लिए तो वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें लगभग शून्य के आसपास पहुंच गई थीं।ऐसी स्थिति में सामान्य रूप से जनता को सस्ता पेट्रोल-डीजल मिलना चाहिए था। लेकिन भारत में इसका उल्टा हुआ। अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरने के बावजूद एक्साइज ड्यूटी और सेस बढ़ाए गए। परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं को उस गिरावट का पूरा लाभ नहीं मिला।
2020 में पेट्रोल-डीजल के कुल मूल्य में करों की हिस्सेदारी लगभग 65–69% तक पहुंच गई थी। अर्थात यदि कोई ग्राहक ₹100 का ईंधन खरीद रहा था, तो उसमें लगभग ₹65 से ₹69 सीधे कर के रूप में सरकार के पास जा रहे थे।
यही कारण है कि आज युद्ध जैसी परिस्थितियों के बावजूद भारत में कीमतों में अपेक्षाकृत कम वृद्धि दिखाई देती है। क्योंकि सरकार पहले से ही कई वर्षों से युद्धकाल जैसी कर व्यवस्था लागू किए हुए थी।

 क्या पिछले 6–7 वर्षों में जनता से लगभग दोगुना कर वसूला गया!?

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 2014 से पहले पेट्रोल-डीजल पर करों की हिस्सेदारी सामान्यतः 25–35% के बीच रहती थी। लेकिन बाद के वर्षों में यह लगातार 50% से अधिक रही और कुछ समय तो 70% के आसपास पहुंच गई।सरल भाषा में कहें तो जनता से पहले की तुलना में कहीं अधिक कर वसूला गया और आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाला गया।
इसलिए सवाल केवल इतना नहीं है कि सरकार ने ₹1 लाख करोड़ छोड़े।
बड़ा सवाल यह है कि पिछले दशक में पेट्रोल-डीजल से सरकार को कुल कितनी अतिरिक्त आय प्राप्त हुई?

ऊंचे ईंधन कर का असर किस पर पड़ता है?

आज भी कुछ लोग यह मानते हैं कि पेट्रोल या डीजल ₹8–10 महंगा हो जाए तो उससे कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता।

लेकिन वास्तविकता यह है कि इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है।

क्योंकि:

* ट्रक भाड़ा बढ़ता है।
* कृषि लागत बढ़ती है।
* दूध, सब्जियां और अनाज महंगे होते हैं।
* ऑनलाइन डिलीवरी महंगी होती है।
* छोटे व्यापारियों का लाभ घटता है।
* बस और सार्वजनिक परिवहन महंगा होता है।
* उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है।
इस प्रकार ईंधन पर लगाया गया कर पूरी अर्थव्यवस्था में महंगाई का प्रमुख कारण बन जाता है।

 बिना युद्ध के भी युद्ध जैसा कर?

सामान्यतः दुनिया के अधिकांश देशों में इतना भारी कर केवल युद्ध, आर्थिक आपदा या गंभीर वित्तीय संकट की स्थिति में लगाया जाता है, जब सरकार को अतिरिक्त राजस्व की आवश्यकता होती है।लेकिन भारत में कई आलोचकों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से बिना किसी युद्ध जैसी स्थिति के भी जनता पर भारी ईंधन कर लगाया गया।विशेष रूप से तब, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तब भी उसका पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचाया गया।

सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सरकार ने ₹1 लाख करोड़ छोड़े या नहीं।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पिछले 10 वर्षों में जनता ने पेट्रोल-डीजल पर कुल कितने लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त कर के रूप में चुकाए?

और यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तो उसका पूरा लाभ जनता को क्यों नहीं मिला?

आखिर वह अतिरिक्त कर राशि कहां गई?

पिछले दशक में कर बढ़े, जुर्माने बढ़े, राजस्व बढ़ा, सरकारी संपत्तियों का हस्तांतरण हुआ, बहुमूल्य सरकारी जमीनें दी गईं, कर संग्रह बढ़ा, शेयर बाजार से प्राप्त आय भी बढ़ी — फिर भी देश का कुल सरकारी कर्ज कई गुना बढ़ गया।

ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि आय के लगभग सभी स्रोत बढ़े, तो फिर कर्ज भी इतनी तेजी से क्यों बढ़ा?

इसी बीच सरकार, उसके मंत्री, समर्थक और मीडिया का एक वर्ग लगातार यह साबित करने में लगा है कि यह सब आवश्यक था और इसके बिना देश नहीं चल सकता था।
लेकिन अंततः राजनीति नहीं, आंकड़े बोलते हैं।और आंकड़े अक्सर वे राज खोल देते हैं जिन्हें भाषण छिपाने की कोशिश करते हैं।

 आखिर में,तो आंकड़े बोलते हे।
और वहीं सही राज खोलते हे।

रिपोर्टर : चंद्रकांत पुजारी

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