विजया पार्वती व्रत 2026: अखंड सौभाग्य और साधना का 5-दिवसीय अनुष्ठान

साहित्य : भारतीय संस्कृति में पारिवारिक सुख-समृद्धि, अखंड सौभाग्य और मनभावन जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए अनेक व्रत-त्योहारों का विधान है। इन्हीं में से आषाढ़ मास के उत्तरार्ध में आने वाला 'विजया पार्वती व्रत' (जिसे जया-पार्वती व्रत के नाम से भी जाना जाता है) अपनी अनूठी साधना शैली और कठोर नियमों के लिए विशेष पहचान रखता है।

गणगौर, कजरी तीज और हरतालिका तीज की तरह ही यह 5 दिवसीय महाव्रत महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। वर्ष 2026 में इस व्रत की शुरुआत 27 जुलाई (सोमवार) से हो रही है। आइए जानते हैं इस व्रत के धार्मिक महत्त्व, तिथियों, प्रदोष काल पूजा मुहूर्त और इसके मुख्य नियमों के बारे में।
 क्यों खास है यह 5-दिवसीय साधना?
शास्त्रों के अनुसार, विजया पार्वती व्रत केवल साधारण पूजा-पाठ तक सीमित न होकर तपस्या, संयम और प्राकृतिक अंकुरण (जवा/ज्वारे) के माध्यम से जीवन में नए रंग और समृद्धि लाने का प्रतीक है।
'अलोना' व्रत का कठोर नियम: इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन 5 दिनों तक व्रती महिलाएं भोजन में *नमक का पूरी तरह से त्याग* करती हैं। नमक रहित रहने के कारण इसे 'अलोना व्रत' भी कहा जाता है। इसमें केवल दूध, दही, फल और सात्विक फलाहार ही ग्रहण किया जाता है।
जवा (ज्वारे) रोपण और पूजन: व्रत के पहले दिन (त्रयोदशी) मिट्टी के एक पवित्र पात्र में जौ या गेहूं बोए जाते हैं, जिन्हें 'जवा' या 'ज्वारे' कहा जाता है। 5 दिनों तक नियमित रूप से इन्हें सींचा जाता है और पूजा की जाती है। व्रत के समापन पर इन्हें पवित्र जल में प्रवाहित किया जाता है, जो जीवन में निरंतर वृद्धि, सुख और खुशहाली का संदेश देता है।
 विजया पार्वती व्रत 2026: तिथियां और प्रदोष काल पूजा मुहूर्त
आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि से प्रारंभ होकर यह व्रत 5 दिनों तक चलता है और पांचवें दिन रात्रि जागरण के बाद समाप्त होता है।
| कार्यक्रम / तिथि | पंचांग अनुसार समय / विवरण |
|---|---|
| *त्रयोदशी तिथि प्रारंभ* | 26 जुलाई 2026, दोपहर 01:57 बजे से |
| *त्रयोदशी तिथि समाप्त* | 27 जुलाई 2026, शाम 04:14 बजे तक |
| *व्रत प्रारंभ तिथि* | *27 जुलाई 2026 (सोमवार)* |
| *प्रथम दिन प्रदोष काल पूजा मुहूर्त* | शाम 07:15 बजे से रात 09:20 बजे तक (अवधि: 2 घंटे 05 मिनट) |
| *व्रत पारण व समाप्ति तिथि* | *1 अगस्त 2026 (शनिवार)* |
> *विशेष योग:* इस वर्ष व्रत का शुभारंभ *सोमवार* के दिन से हो रहा है। सोमवार भगवान शिव का अत्यंत प्रिय दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन से व्रत की शुरुआत होना साधकों के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी रहेगा।

 धार्मिक महत्त्व और मनोकामना पूर्ति
सौभाग्यवती महिलाओं के लिए: इस कठिन 5-दिवसीय साधना से पति को दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, साथ ही दांपत्य जीवन में मधुरता और प्रेम बना रहता है।
अविवाहित कन्याओं के लिए:  मान्यता है कि जिस निष्ठा से माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, उसी भाव से यह व्रत करने पर कन्याओं को सुयोग्य, संस्कारी और अनुकूल जीवनसाथी मिलता है।
संतान सुख के लिए: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यदि संतानहीन दंपति पूर्ण श्रद्धा से इस नमक-रहित (अलोना) व्रत का पालन करते हैं, तो उन्हें उत्तम संतान की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
 पूजा विधि और मुख्य नियम
 1. प्रथम दिन (27 जुलाई): प्रातःकाल स्नान के पश्चात हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। मिट्टी के पात्र में जौ या गेहूं बोकर 'जवा' की स्थापना करें। शाम के समय प्रदोष काल (शाम 07:15 से रात 09:20 तक) में शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा करें।
 2. द्वितीय से चतुर्थ दिन:  रोजाना सुबह-शाम ज्वारे की पूजा करें, उन्हें जल चढ़ाएं और नमक-रहित फलाहार ग्रहण करें। दिनभर 'ॐ नमः शिवाय' या माँ पार्वती के मंत्रों का जाप करें।
 3. पांचवां दिन (1 अगस्त):  इस दिन पूरे नियम से पूजा के बाद रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करने का विधान है।
 4. व्रत का पारण: अगले दिन प्रातः ज्वारे को किसी पवित्र नदी या बहते जल में प्रवाहित करें। इसके बाद उद्यापन और ब्राह्मणों/कन्याओं को दान-दक्षिणा देने के पश्चात नमक युक्त सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत का पारण करें।

विजया पार्वती व्रत कथा (पौराणिक कथा)
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कौंडिन्यपुर नामक नगर में वामन नाम का एक अत्यंत धार्मिक और दयालु ब्राह्मण अपनी पत्नी सत्या के साथ रहता था। ब्राह्मण दंपति सभी गुणों से संपन्न थे और नगर में उनका बहुत सम्मान था, लेकिन उनके जीवन में केवल एक ही दुख था—उन्हें कोई संतान नहीं थी।
ब्राह्मण दंपति दिन-रात भगवान शिव और माता पार्वती की भक्ति में लीन रहते थे। उनकी निश्छल भक्ति और कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान देने की प्रार्थना की।
भगवान शिव ने अंतर्ध्यान होकर ब्राह्मण से कहा, "हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम्हारे भाग्य में पुत्र सुख नहीं है, परंतु तुम्हारी निष्ठा से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें एक वरदान देता हूँ। यदि तुम्हारी पत्नी आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होने वाले 5-दिवसीय 'अलोना व्रत' (विजया पार्वती व्रत) का पूरे विधि-विधान और बिना नमक ग्रहण किए पालन करेगी, तो तुम्हें एक दिव्य और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। परंतु ध्यान रहे, उस बालक की आयु केवल 16 वर्ष होगी।"
ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने शिवजी की आज्ञा शिरोधार्य की और सत्या ने पूरी श्रद्धा व नियमों का पालन करते हुए 5 दिनों तक बिना नमक का भोजन किए विजया पार्वती व्रत रखा और जवा (ज्वारे) का पूजन किया। व्रत के प्रभाव से सत्या ने एक अत्यंत सुंदर और बुद्धिमान पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम विनायक रखा गया।
समय बीतता गया और जब विनायक 16वें वर्ष में प्रवेश करने वाला था, तब उसके माता-पिता को शिवजी के वचन की चिंता सताने लगी। उन्होंने विनायक का विवाह एक ऐसी संस्कारी कन्या से कराया, जिसकी माता भी नियमित रूप से विजया पार्वती व्रत का पालन करती थी।
16वें वर्ष में जब विनायक जंगल में लकड़ी काटने गया, तो सर्पदंश (सांप के काटने) के कारण वह अचेत होकर गिर पड़ा। ठीक उसी समय उसकी पत्नी और माता सत्या घर पर विजया पार्वती व्रत का अंतिम दिन (जागरण) पूरा कर रही थीं। दोनों ने पूर्ण निष्ठा और अश्रुपूरित नेत्रों से माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना की।
उनकी अटूट भक्ति और विजया पार्वती व्रत के पुण्य प्रभाव से माता पार्वती और भगवान शिव प्रकट हुए। माता पार्वती ने अपनी कृपा से विनायक को पुनर्जीवन (जीवनदान) प्रदान किया और उसे दीर्घायु का आशीर्वाद दिया। विनायक सकुशल अपने घर लौट आया।
 कथा का सार और धार्मिक महत्त्व
तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि जो भी महिला या कन्या आषाढ़ मास में इस 5-दिवसीय विजया पार्वती व्रत को सच्चे मन, अलोना (बिना नमक) संयम और नियमपूर्वक करती है, उसके पति और संतान पर आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं तथा घर में सुख, शांति और अखंड सौभाग्य का वास होता है।

रिपोर्टर : चंद्रकांत पुजारी

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