मुलायम से कांशीराम तक: भारतीय राजनीति में 'जय श्रीराम' की हवा

 भारतीय राजनीति की इस बदलती तस्वीर में हर नया मोड़ एक नई कहानी कहता है। हाल ही में सुनी हुई पंक्ति — “मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम” — बुनियादी तौर पर उस समीकरण को उजागर करती है जो उत्तर प्रदेश और देश भर में जातीय और धर्म आधारित राजनीति के मायने समझने में मदद करती है। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम जैसे नेता अपने समय के दो प्रमुख चेहरे थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति में अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों के मतों की राजनीति को आकार दिया। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी विचारधारा और कांशीराम के बहुजन मुक्ति आंदोलन ने समाज में ऐतिहासिक आधार पर सत्ता-संतुलन की दिशा को परिभाषित किया। लेकिन जब उनकी राजनीति का मुकाबला हिंदू राष्ट्रवाद और मंदिर आंदोलन से हुआ, तो ‘जय श्रीराम’ के नारे हवा में उभर आए। इस नारे का प्रयोग अब केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं रहा; यह राजनीतिक हथियार बन चुका है, जिससे मतदाताओं के मनोविज्ञान को आकार दिया जा रहा है।

आज, जब हम उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में चुनावी परिदृश्य को देखते हैं, तो यह साफ दिखता है कि पुरानी जातीय और क्षेत्रीय राजनीति के ठोस आधार अब धीरे-धीरे धर्म और भावनात्मक आधार पर टकरा रहे हैं। मुलायम और कांशीराम की पीढ़ी ने जो राजनीतिक गठजोड़ बनाये, वह अब बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों के ‘हिंदुत्व’ एजेंडे के सामने नए तरीके से चुनौती दे रहा है। ‘जय श्रीराम’ का नारा, जो कभी सिर्फ धार्मिक उत्सवों तक सीमित था, आज चुनावी रैलियों, सोशल मीडिया ट्रेंड और राजनीतिक अभियानों में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। ये नारे केवल भावनाओं का प्रतीक नहीं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि भारतीय राजनीति अब प्रतीकात्मक राजनीति, सोशल मीडिया और इमेज-बिल्डिंग पर अधिक केंद्रित हो गई है।

सत्तारूढ़ दल के लिए यह नारा वोट बैंक मजबूत करने का जरिया बन चुका है। इसका असर यह भी हुआ कि कई पुराने दल, जो कभी जातीय समीकरणों और वर्ग-आधारित राजनीति पर भरोसा करते थे, अब अपनी रणनीति में धर्म और सांस्कृतिक प्रतीकों को जोड़ने लगे हैं। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश जैसी प्रमुख राजनीति के केंद्र में, छोटे-मध्यम दलों के गठबंधन और बड़े दलों की नीतियों के बीच ‘जय श्रीराम’ का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह राजनीतिक बदलते समय की अनिवार्य धारा है, जहां भावनाओं, प्रतीकों और मीडिया रणनीति के मिश्रण से सत्ता की दिशा तय होती है।

यानी, पंक्ति “मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम” न केवल बीते दौर की राजनीतिक वास्तविकताओं का प्रतीक है, बल्कि यह वर्तमान राजनीतिक स्थिति का भी सटीक परिचायक है। यह हमें यह याद दिलाती है कि भारतीय राजनीति में न केवल जाति और वर्ग, बल्कि धर्म और प्रतीकात्मक राजनीति भी निर्णायक भूमिका निभाती है। आज के डिजिटल और सोशल मीडिया युग में, चुनावी रणनीतियाँ सिर्फ जमीन पर नहीं बल्कि हवा में, यानी लोगों की सोच और भावनाओं में भी फैल रही हैं। यही वजह है कि इस नारे की हवा सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं, बल्कि देश भर में राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर रही है।

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