समस्तीपुर का सांप मेला: 300 साल पुरानी परंपरा जहां सांपों को देवता मानते हैं लोग
बिहार के समस्तीपुर में नाग पंचमी पर अनोखा सांप मेला, जहां डर नहीं, श्रद्धा है सांपों के प्रति
भारत विविध परंपराओं का देश है, जहां हर पर्व का अपना अनोखा रूप देखने को मिलता है। इन्हीं में से एक है बिहार के समस्तीपुर ज़िले में नाग पंचमी के अवसर पर लगने वाला 'सांप मेला', जो इन दिनों सोशल मीडिया पर खासा चर्चा में है। इस मेले में बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग – सभी जिंदा सांपों को गले में डालकर, सिर पर रखकर या हाथ में पकड़कर रैली में शामिल होते हैं।
300 साल पुरानी परंपरा
इस मेले की परंपरा कोई नई नहीं, बल्कि इसकी जड़ें करीब तीन सदियों पुरानी मानी जाती हैं। सिंघिया घाट पर हर साल नाग पंचमी के दिन लगने वाले इस मेले का उद्देश्य नाग देवता की कृपा प्राप्त करना और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करना होता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पर्व से कुछ सप्ताह पहले ही ग्रामीण जंगलों से सांपों को पकड़ लाते हैं और उन्हें बड़े प्रेम से रखते हैं। नाग पंचमी के दिन विधिवत पूजा के बाद इन सांपों को वापस जंगल में छोड़ दिया जाता है।
सांपों से डर नहीं, श्रद्धा है
वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी बिना किसी भय के सांपों को हाथों में पकड़े मेले में घूम रहे हैं। कुछ युवक सांपों के साथ करतब भी दिखाते हैं। यह परंपरा इस बात की गवाही देती है कि मिथिला क्षेत्र में सांपों को खतरनाक नहीं बल्कि देवता के रूप में पूजा जाता है।
धार्मिक आस्था बनाम पशु क्रूरता
हालांकि इस परंपरा को लेकर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ यूजर्स ने इसे भारत की सांस्कृतिक धरोहर करार दिया, वहीं कुछ ने इसे पशु क्रूरता बताते हुए आलोचना की। एक यूजर ने लिखा – "ये परंपरा नहीं, जानवरों के साथ क्रूरता है," तो दूसरे ने मजाक में कहा – "हम अंग्रेजों से नहीं, अंग्रेज हमसे आज़ाद हुए थे।"
आस्था और रहस्य का संगम
समस्तीपुर का यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की गहरी आस्था, परंपरा और रहस्य का जीवंत संगम भी है। यह परंपरा बताती है कि भारत में श्रद्धा का स्वरूप कैसा भी हो सकता है – चाहे वो सांप के रूप में पूजे जाने वाले देवता ही क्यों न हों।
सांपों से जुड़ी आशंकाओं और भय के बावजूद, समस्तीपुर का 'सांप मेला' आज भी हजारों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का पर्व बना हुआ है, जो पीढ़ियों से जीवित है और शायद आगे भी जीवित रहेगा।

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