एक कुर्सी, दो दावे और कई सवाल! बतौली स्कूल में DDO प्रभार को लेकर घमासान
सरगुजा : शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बतौली में DDO (आहरण एवं संवितरण अधिकारी) के प्रभार को लेकर विवाद अब महज प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं रह गया है। 24 सितंबर को एक आदेश और 29 सितंबर को दूसरा निर्देश सामने आने के बाद स्कूल की DDO कुर्सी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। जनप्रतिनिधियों की आपत्ति, गुप्ता का पलटवार और अब विद्यालय के भीतर जिम्मेदारी को लेकर संभावित दावेदारी की चर्चाओं ने पूरे मामले को और दिलचस्प बना दिया है।
24 सितंबर को गुप्ता को मिली जिम्मेदारी
जिला शिक्षा अधिकारी सरगुजा कार्यालय से जारी आदेश क्रमांक 17022, दिनांक 24 सितंबर 2026 में तत्कालीन प्राचार्य श्रीमती प्रसन्ना केरकेट्टा के निलंबन के बाद शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बतौली में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं आकस्मिक व्यय के देयकों के आहरण-संवितरण के लिए राजेश कुमार गुप्ता, प्राचार्य पीएमश्री स्वामी आत्मानंद विद्यालय बतौली को आगामी आदेश तक अधिकृत किया गया।
अर्थात 24 सितंबर के आदेश के बाद DDO की महत्वपूर्ण वित्तीय जिम्मेदारी गुप्ता के पास आ गई।
पांच दिन बाद बदला समीकरण
मामला यहीं नहीं रुका। 29 सितंबर 2026 को संभागीय संयुक्त संचालक, शिक्षा सरगुजा संभाग की ओर से जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र जारी हुआ। पत्र में जनप्रतिनिधि और शाला प्रबंधन एवं विकास समिति की ओर से गुप्ता को DDO प्रभार दिए जाने पर असंतोष का उल्लेख किया गया।
इसके बाद संभागीय संयुक्त संचालक ने शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बतौली के वरिष्ठ व्याख्याता को DDO का प्रभार देने संबंधी आदेश जारी करने और इसकी रिपोर्ट संभागीय कार्यालय को भेजने के निर्देश दिए।
यानी महज पांच दिन के भीतर DDO की कुर्सी को लेकर विभागीय स्तर पर तस्वीर बदलती नजर आई।
जनप्रतिनिधियों का सवाल—एक व्यक्ति के हाथ में दोनों संस्थाओं का प्रभाव क्यों?
जनप्रतिनिधियों की ओर से सवाल उठाया जा रहा है कि राजेश गुप्ता के पूर्व में संस्था से जाने के बाद पुनः व्यवस्था में आने और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने से दोनों संस्थाओं की प्रशासनिक व्यवस्था पर उनका प्रभाव बढ़ सकता है।
उनका आरोप है कि गुप्ता के आने के बाद संस्था की व्यवस्था को अपने हिसाब से संचालित करने की स्थिति बन रही है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि विद्यालय किसी एक व्यक्ति के प्रभाव में नहीं, बल्कि विभागीय नियमों और निर्धारित प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार संचालित होना चाहिए।
जनप्रतिनिधियों की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि एक ही व्यक्ति के पास दोनों संस्थाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां रहेंगी तो क्या इसका असर दोनों जगह की शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर नहीं पड़ेगा?
दूसरी तरफ गुप्ता का पलटवार—“पहले भी एक प्राचार्य संभाल रहे थे दोनों की जिम्मेदारी”
वहीं राजेश कुमार गुप्ता का पक्ष इससे बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि जब उनका पूर्व में स्थानांतरण हुआ था, उस समय दोनों विद्यालयों का प्रभार एक ही प्राचार्य श्रीमती प्रसन्ना केरकेट्टा के पास था। तब इस व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठाया गया।
गुप्ता का कहना है कि उन्हें जो जिम्मेदारी मिली थी, वह विभागीय आदेश के आधार पर मिली थी और वे नियमों के दायरे में रहकर ही काम करेंगे। उनका कहना है कि स्कूल में उपस्थिति, वेतन और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं में जहां कमियां होंगी, उन्हें नियमानुसार सुधारने का प्रयास किया जाएगा।
गुप्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ लोगों को उनके आने से परेशानी हो रही है और जनप्रतिनिधियों को भ्रमित कर उन्हें जिम्मेदारी से हटाने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या मामला सिर्फ व्यवस्था का है या ‘DDO की कुर्सी’ की भी खींचतान?
पूरे घटनाक्रम के बीच एक और चर्चा ने जोर पकड़ा है। विद्यालय के भीतर कुछ शिक्षकों की DDO की जिम्मेदारी संभालने में रुचि होने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या गुप्ता को DDO जिम्मेदारी मिलना कुछ लोगों को इसलिए रास नहीं आ रहा क्योंकि इससे विद्यालय के भीतर किसी अन्य दावेदार की संभावना प्रभावित होती है?
दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों की ओर से इसे केवल व्यक्तिगत या पद की लड़ाई नहीं, बल्कि विद्यालय की व्यवस्था और दोनों संस्थाओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का विषय बताया जा रहा है।
इस तरह एक तरफ जनप्रतिनिधियों की आपत्ति है, तो दूसरी तरफ गुप्ता का आरोप है कि उनके खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है और उन्हें हटाने के लिए जनप्रतिनिधियों को भ्रमित किया जा रहा है।
आमने-सामने दोनों पक्ष,फैसला अब विभाग के हाथ
इस पूरे विवाद में एक तरफ* 24 सितंबर का DEO आदेश है, जिसमें गुप्ता को DDO की जिम्मेदारी दी गई थी। दूसरी तरफ 29 सितंबर का संभागीय संयुक्त संचालक का निर्देश है, जिसमें वरिष्ठ व्याख्याता को DDO प्रभार देने संबंधी आदेश जारी करने को कहा गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या DDO की कुर्सी वास्तव में प्रशासनिक व्यवस्था का विषय है, या इसके पीछे विद्यालय के भीतर जिम्मेदारी और प्रभाव को लेकर चल रही खींचतान भी कोई भूमिका निभा रही है?
फिलहाल दस्तावेज यह जरूर बताते हैं कि पांच दिनों के भीतर DDO प्रभार को लेकर विभागीय स्तर पर दो महत्वपूर्ण कदम सामने आए हैं। आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा संभागीय निर्देश पर की जाने वाली कार्रवाई के बाद ही साफ होगी।
रिपोर्टर : रिंकु सोनी

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