सरोजिनी नायडू: भारत की नाइटेंगेल और स्वतंत्रता की प्रेरणा

सरोजिनी नायडू (1879–1949) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान नेता, कवयित्री और समाजसेवी थीं। उन्हें "भारत की  नाइटेंगेल" के नाम से जाना जाता है। उनकी कविताओं में भारतीय संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता और देशभक्ति की भावनाएँ प्रमुख रूप से प्रकट होती हैं।

प्रारंभिक जीवन

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद (तेलंगाना, भारत) में हुआ था। उनके पिता, राजा चंद्रशेखर नायडू, एक प्रसिद्ध वकील और स्वतंत्रता प्रेमी थे। माता, अम्मु लाल, बंगाली थी और उन्हें साहित्य में गहरी रुचि थी।
सरोजिनी बचपन से ही अध्ययन और साहित्य में निपुण थीं। उन्होंने कैंब्रिज और लंदन में शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य और कविता में विशेष ज्ञान प्राप्त किया।

साहित्यिक योगदान

सरोजिनी नायडू की कविताएँ भारतीयता, प्रकृति और महिला सशक्तिकरण की प्रेरक कहानियों से भरी हैं। उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं:

  • गोल्डन थ्रेशोल्ड्स
  • दि पथवे
  • इंग्लिश एंड हिंदु कविताएँ

उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि देशभक्ति और सामाजिक चेतना जगाने के लिए भी प्रसिद्ध हैं।

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

सरोजिनी नायडू ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने कई आंदोलनों में हिस्सा लिया, जिनमें नमक सत्याग्रह और स्वदेशी आंदोलन प्रमुख थे।
वह पहली महिला थीं, जिन्हें 1947 में स्वतंत्र भारत की गवर्नर ऑफ उत्तर प्रदेश बनाया गया।

समाज सेवा और महिला अधिकार

सरोजिनी नायडू ने महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक जीवन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।

मृत्यु और विरासत

सरोजिनी नायडू का निधन 27 मार्च 1949 को हुआ। उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। उन्हें न केवल एक महान कवयित्री बल्कि एक प्रेरक नेता के रूप में भी स्मरण किया जाता है।


सरोजिनी नायडू का जीवन प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने शब्दों और कार्यों से देशभक्ति, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सेवा की मिसाल पेश की। उनकी कविताएँ आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं और स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाती हैं।

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