लघु कथा: क्या हम सच में प्रकृति का संरक्षण कर रहे हैं?
विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर विद्यालय में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया। सभी बच्चों ने उत्साह से पौधे लगाए और "प्रकृति बचाओ" के नारे लगाए।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद शिक्षक ने देखा कि कुछ बच्चे पानी की बोतलें और प्लास्टिक के रैपर वहीं फेंककर चले गए। अगले दिन लगाए गए कई पौधे भी बिना पानी के मुरझाने लगे।
शिक्षक ने सभी विद्यार्थियों को बुलाया और एक सूखे पौधे की ओर इशारा करते हुए पूछा, "बताओ, इस पौधे को किसने लगाया था?"
राहुल ने हाथ उठाकर कहा, "सर, मैंने लगाया था।"
शिक्षक मुस्कुराए और बोले, "पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसकी देखभाल करना ही वास्तविक संरक्षण है। केवल एक दिन फोटो खिंचवाने या नारे लगाने से प्रकृति नहीं बचती।"
राहुल की आँखें झुक गईं। उसी दिन उसने अपने मित्रों के साथ मिलकर सभी पौधों को पानी दिया, आसपास फैला प्लास्टिक उठाया और यह संकल्प लिया कि वे हर सप्ताह पौधों की देखभाल करेंगे।
कुछ महीनों बाद वही छोटे-छोटे पौधे हरे-भरे वृक्ष बन चुके थे। अब विद्यालय का परिसर पहले से अधिक सुंदर और ठंडा महसूस होता था। बच्चों को समझ आ गया था कि प्रकृति की रक्षा शब्दों से नहीं, कर्मों से होती है।
शिक्षा :
"प्रकृति संरक्षण केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि हर दिन निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है। जो प्रकृति की रक्षा करता है, प्रकृति भी उसकी रक्षा करती है।"
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