सेवा का सुख जिसे केवल सेवक ही जनता है.....
एकादशी हमें केवल व्रत रखने की प्रेरणा नहीं देती, बल्कि सेवा के वास्तविक भाव को भी समझने का अवसर देती है। यह दिन हमें सिखाता है कि भगवान तक पहुंचने का मार्ग केवल अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि निष्काम सेवा, विनम्रता और समर्पण से प्रशस्त होता है।
जब भगवान अपने भक्त की सेवा को स्वीकार कर उसी सेवा से स्वयं को अलंकृत करते हैं, तब वह क्षण केवल आंखों से देखने का नहीं, बल्कि हृदय से अनुभव करने का होता है। प्रभु को अपने हाथों से बनाई हुई पोशाक, आभूषण या किसी भी सेवा में सुसज्जित देखना ऐसा आनंद देता है, जिसे शब्दों में बांधना संभव नहीं।
गोस्वामी परिवार में जन्म लेना निश्चय ही महान सौभाग्य है। उनके रक्त की प्रत्येक बूंद में पीढ़ियों से चली आ रही सेवा, समर्पण और भक्ति की परंपरा प्रवाहित होती है। फिर भी केवल इस परंपरा का उत्तराधिकारी होना ही पर्याप्त नहीं। वे निरंतर तप, साधना, परिश्रम और विनम्रता के साथ ठाकुरजी की सेवा में स्वयं को अर्पित करते हैं। उनके लिए सेवा कोई दायित्व नहीं, बल्कि जीवन का प्राण है।
विशेषकर जब किसी गोस्वामी परिवार की बेटी अपने हाथों से प्रभु के लिए पोशाक तैयार करती है और वही पोशाक ठाकुरजी धारण करते हैं, तब वह केवल वस्त्र नहीं रह जाता—वह प्रेम, तपस्या और समर्पण का सजीव स्वरूप बन जाता है। प्रभु द्वारा उस सेवा का स्वीकार किया जाना किसी भी सेवक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।
आइए, इस योगिनी एकादशी पर हम गोस्वामी परिवार की सेवा-भावना से प्रेरणा लें। सेवा को अधिकार नहीं, सौभाग्य मानें; सम्मान नहीं, समर्पण खोजें; और ऐसा हृदय विकसित करें जो केवल एक ही प्रार्थना करे—"हे प्रभु! मुझे भी आपकी सेवा का एक छोटा-सा माध्यम बना दीजिए।"
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