सेवा की अपनी एक पहचान—श्रृंगार में झलकता है भाव

श्री राधारमण लाल जू की सेवा केवल विधि-विधान का पालन नहीं, बल्कि प्रेम और भाव से ठाकुरजी को लाड-लड़ाने की एक जीवंत परंपरा है। आचार्य श्री की सेवा में यह भाव कई बार उन छोटी-छोटी बारीकियों में दिखाई देता है, जिन्हें पहली नजर में देखना शायद आसान न हो, लेकिन अनुभव करने पर वे मन में बस जाती हैं।
ठाकुरजी के श्रृंगार में कभी कोई रंग, कोई आभूषण या कोई विशेष साज-सज्जा अपने आप में एक कहानी कहती नजर आती है। ऐसी ही एक अनोखी झलक तब दिखाई देती है, जब लाल जू के श्रृंगार में एक छोटी-सी ‘लाली’ भी मानो उनके स्वरुप में सजी हुई दिखाई देती हैं। यह केवल श्रृंगार की सुंदरता नहीं, बल्कि सेवा में समाए उस भाव की अभिव्यक्ति है, जिसमें ठाकुरजी के स्वरूप को सजाने के साथ-साथ उनके प्रति आत्मीयता भी पिरोई जाती है।


आचार्य श्री की सेवा की यही विशेषता है—हर सेवा में कोई न कोई भाव अपनी अलग पहचान बना लेता है। कहीं सादगी में प्रेम दिखाई देता है, तो कहीं श्रृंगार की एक छोटी-सी कल्पना में ठाकुरजी के प्रति अपनापन झलक उठता है। आचार्य श्री की सेवा की बारीकियों में छिपा है प्रेम का भाव।
मानो सेवा करने वाले हाथ केवल श्रृंगार नहीं कर रहे, बल्कि अपने भावों को ठाकुरजी के स्वरूप में धीरे-धीरे बुन रहे हों।
और शायद इसी कारण यह सेवा अपनी एक अलग छाप छोड़ जाती है....
लाल जू के श्रृंगार में विविधताएँ, और उसके पीछे छिपा आचार्य श्री का अनकहा भाव।
यह वह सुंदरता है जिसे केवल देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है—क्योंकि जहां सेवा में भाव जुड़ जाए, वहां हर श्रृंगार अपने आप एक कथा कहने लगता है।

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