आंदोलन या अराजकता- लोकतंत्र की कसौटी पर कौन?

शाजापुर : लोकतंत्र में जनभावनाओं का सम्मान आवश्यक है, किंतु जनभावनाओं के नाम पर अराजकता का समर्थन कभी नहीं किया जा सकता। आंदोलन का उद्देश्य व्यवस्था को सुधारना होना चाहिए, व्यवस्था को ठप करना नहीं।

दिल्ली में सीजेपी के आंदोलन के संदर्भ में एक मूलभूत प्रश्न उठता है—जब भीड़ सड़कों पर उतरती है, तब उसका एक वर्ग प्रायः यह नहीं सोचता कि सार्वजनिक संपत्ति को होने वाली क्षति अंततः देश की ही हानि है; कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाला दबाव नागरिकों के जीवन को प्रभावित करता है; और विश्व के सामने बनने वाली छवि पूरे राष्ट्र से जुड़ी होती है। आक्रोश यदि अनुशासन की मर्यादा लांघ जाए, तो वह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, लोकतांत्रिक चुनौती बन जाता है।

इसके विपरीत, सरकार केवल किसी एक समूह के दबाव से संचालित नहीं होती। उसके सामने करोड़ों नागरिकों का हित, लाखों युवाओं का भविष्य, राष्ट्र की संस्थाओं की विश्वसनीयता, कानून-व्यवस्था की स्थिरता और देश की प्रतिष्ठा—सभी एक साथ उपस्थित होते हैं। इसलिए अनेक बार सरकार ऐसे निर्णय लेती है जो केवल तत्कालीन विवाद को समाप्त करने के लिए नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।

यदि सरकार जनभावनाओं को सुनती है, संवाद करती है, निर्णयों की समीक्षा करती है या उत्तरदायित्व तय करती है, तो इसे केवल "झुकना" कह देना वास्तविकता का सरलीकरण होगा। यह एक उत्तरदायी शासन की पहचान भी हो सकती है, जो संघर्ष के स्थान पर समाधान और टकराव के स्थान पर संतुलन को प्राथमिकता देता है।

लोकतंत्र की शक्ति सड़क पर शोर मचाने में नहीं, बल्कि सत्य, संयम और उत्तरदायित्व के संतुलन में निहित है। आंदोलन तभी सार्थक है जब वह राष्ट्रहित को केंद्र में रखे। और शासन तभी सफल है जब वह जनभावनाओं का सम्मान करते हुए राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करे।

राष्ट्र की संपत्ति, राष्ट्र की प्रतिष्ठा और राष्ट्र की व्यवस्था—ये किसी सरकार या दल की नहीं, पूरे भारत की धरोहर हैं। इसलिए असहमति का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह राष्ट्रहित और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर अभिव्यक्त हो।
 

रिपोर्टर : रमेश राजपूत

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