भारत के प्रसिद्ध ग़ज़लकार और उनकी मशहूर ग़ज़ल/शेर
ग़ज़ल एक ऐसी अद्भुत काव्य शैली है जिसमें प्रेम, विरह, जीवन की पीड़ा और संवेदनाओं को बेहद नाजुकता से प्रस्तुत किया जाता है। भारत में ग़ज़ल का समृद्ध इतिहास है और कई कवियों ने इसे अपनी अनोखी शैली और भावपूर्ण शब्दों से समृद्ध किया।
इस आर्टिकल में हम भारत के 10 प्रमुख ग़ज़लकारों और उनकी कुछ प्रसिद्ध ग़ज़लों को प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी हमारे दिलों को छूती हैं।
1. मिर्ज़ा ग़ालिब (1797–1869)

"हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।"
2. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (1911–1984)

"गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले,
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।"
3. गुलज़ार (1934–वर्तमान)

"कुछ तो बात है तेरे इश्क़ में,
जो हर शख़्स को अपना बना लेता है।"
4. कैफ़ी आज़मी (1919–2002)
"करते हैं नफ़रत दिल से, लेकिन ज़बान से नहीं,
हम लड़ते हैं अंधेरे से, पर डरते नहीं।"
5. मजरूह सुल्तानपुरी (1919–2000)

"मगर मर्ज़ी का खेल है, किसको क्या मंज़ूर है,
हम दिल ही दिल में रोते हैं, दुनिया से नहीं।"
6. जगजीत सिंह (1941–2011)

"हूँ मैं ग़ज़ल का दीवाना,
तुझसे ही जुड़ा हर फसाना।"
7. रहत इंदौरी (1950–2020)
"बुलाती है मुझको मेरी फितरत,
रास्ते खुद ब खुद बन जाते हैं।"
8. जावेद अख़्तर (1945–वर्तमान)

"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीन तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता।"
9. अनवर मसूद (1935–वर्तमान)
"हँसी भी आती है, आँखें भी भर आती हैं,
ज़िंदगी के रंग कुछ इस तरह बदल जाते हैं।"
10. साहिर लुधियानवी (1921–1980)

"कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नजर नहीं आती।"
भारत के ग़ज़लकारों ने प्रेम, विरह, दर्द और जीवन के अनुभवों को अपने शब्दों में खूबसूरती से पिरोया है। मिर्ज़ा ग़ालिब से लेकर गुलज़ार और जावेद अख़्तर तक, इन कवियों की ग़ज़लें आज भी हमारे दिलों को छूती हैं और हमें शब्दों की ताकत का एहसास कराती हैं।
ग़ज़ल सिर्फ़ कविता नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा है, जो हर पाठक को अपने भीतर की गहराई तक ले जाती है।


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