डिग्री कॉलेज का लोकतंत्र और तरियानी का अपराध – रक्षित राज

शिवहर :  शिवहर जिले में शिक्षा का महापर्व मनाया जा रहा है। ढोल बजेगा, फीता कटेगा, भाषण गूंजेंगे, तस्वीरें खिंचेंगी और घोषणा होगी कि "उच्च शिक्षा अब गाँव-गाँव पहुँचेगी।" बस एक भूल हो गई, शिक्षा का यह रथ तरियानी की देहरी पर आकर लंगड़ा गया।

पिपराही , डुमरी कटसरी , पूरनहिया योग्य निकला साथ ही शिवहर तो पहले से ही योग्य था।और अयोग्य ठहरा दिया गया — केवल तरियानी।

उच्चतर शिक्षा प्राप्त कर रहे तरियानी के रक्षित राज ने बताया है कि शायद वहाँ के बच्चों का इकलौता कसूर यही है कि वे गलत प्रखंड में जन्म ले बैठे। संभव है किसी सरकारी फ़ाइल में तरियानी के सामने दर्ज हो — "यहाँ सपनों की अनुमति नहीं है।"

इलाहाबाद में उच्चतर शिक्षा ग्रहण कर रहे रक्षित राज ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि आख़िर डिग्री कॉलेज से मिलेगा भी क्या?छात्र रोज़ 10-20 किलोमीटर नापेंगे तो धैर्य सीखेंगे। बसों के लिए घंटों तरसेंगे तो समय की कीमत जानेंगे। किताबों से ज़्यादा सड़कों से लड़ेंगे तो जीवन का "असली पाठ" पढ़ेंगे। यही शायद नई शिक्षा नीति का चमकता "प्रायोगिक मॉडल" है, जिसका प्रयोगशाला बना दिया गया है एक पूरा प्रखंड, और प्रयोग की कीमत चुका रहे हैं उसके बच्चे।

फिर भी प्रश्न वहीं डटा खड़ा है, अडिग, अटल —
तरियानी क्यों नहीं?

उन्होंने बताया कि यह प्रश्न सिर्फ प्रशासन की देहरी पर नहीं टिकता, बेलसंड विधानसभा के जनप्रतिनिधि के दरवाज़े पर भी दस्तक देता है। क्योंकि तरियानी उन्हीं के प्रतिनिधित्व की छाया में आता है — तो यह चुप्पी उनकी भी है, यह उपेक्षा उनके हस्ताक्षर की भी मोहताज़ है। उन्हें अपनी ही मंत्री डॉक्टर श्वेता गुप्ता से सीखना चाहिए, जिनके विधानसभा क्षेत्र में तीन नए डिग्री कॉलेज खुल गए जहाँ पहले से एक मौजूद था। यह संयोग नहीं — यह इच्छाशक्ति का प्रमाणपत्र है, और उसकी अनुपस्थिति भी उतनी ही बड़ी गवाही है।

रक्षितराज ने कहा है कि कारण प्रशासनिक है, तो बोलिए।भूमि की बाधा है, तो बोलिए।अगला चरण तय है, तो बोलिए।और अगर यह महज़ इत्तेफ़ाक़ है, तो यह इत्तेफ़ाक़ इतना अचूक कैसे है कि पूरे जिले में सिर्फ़ एक ही प्रखंड बार-बार इसका निशाना बनता है?

उन्होंने कहा कि तरियानी आज कॉलेज नहीं माँग रहा। वह सिर्फ़ इतना जानना चाहता है,उसका अपराध क्या है?

तरियानी के हर विद्यार्थी को, हर अभिभावक को यह देख लेना चाहिए कि जिले की तराज़ू में उन्हें किस पलड़े पर तौला जा रहा है। क्योंकि जब किसी धरती को उसका हक़ नहीं मिलता, तो सबसे पहले सुविधाएँ नहीं छिनतीं — सम्मान छिनता है।

रिपोर्टर : संजय गुप्ता

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