महाशिवरात्रि: शिव और शक्ति के दिव्य मिलन की रात

BY - UJJWAL SINGH

 

 

महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र त्यौहार है, जिसे भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन की रात के रूप में मनाया जाता है. यह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा और चेतना के मिलन का प्रतीक है. मंदिरों में रातभर दीपक जलते हैं, घंटियों की ध्वनि गूंजती है और भक्त “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हुए आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

सती के चले जाने के बाद शिव का एकांतवास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सती माता के निधन के बाद भगवान शिव ने संसार से विरक्त होकर गहन तपस्या की. उनका ध्यान और भक्ति जीवन के भौतिक सुखों से परे था। इस दौरान उनके हृदय में शांति और ब्रह्मानंद की खोज चल रही थी.

इस विरक्त अवस्था में ही माता पार्वती ने तपस्या के माध्यम से शिव को पाने का निर्णय लिया. हिमालय में जन्मी राजकुमारी, राजा हिमवान और रानी मैना की संतान, ने भव्य जीवन और सुख-सुविधाओं को त्याग कर कठोर तपस्या का मार्ग चुना.

पार्वती की कठिन तपस्या

शिव पुराण के अनुसार, पार्वती ने बर्फीली हवाओं में ध्यान किया, भोजन केवल पत्तियों तक सीमित कर दिया और अपने शरीर को कठोर तपस्या के माध्यम से तपाया. उनका उद्देश्य केवल शिव का प्रेम प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को उनकी चेतना के स्तर तक उन्नत करना था. उनकी भक्ति और संकल्प ने स्वर्ग को भी हिला दिया। इसी कारण भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए ऋषि का वेश धारण किया.

शिव की परीक्षा और पार्वती का समर्पण

कुमारसंभवम् के अनुसार, ऋषि के वेश में आए शिव ने पार्वती से पूछा कि वे ऐसे योगी को क्यों चाहती हैं जो सांसारिक सुखों से परे हैं.पार्वती ने बिना संकोच के उनके ब्रह्मांडीय स्वरूप, वैराग्य और सर्वोच्च चेतना का वर्णन किया.इस परीक्षा ने सिद्ध कर दिया कि पार्वती की भक्ति केवल प्रेम या आकर्षण नहीं, बल्कि ज्ञान और चेतना में आधारित थी.

विरक्त से गृहस्थ जीवन तक

स्कंद पुराण के अनुसार, अंततः शिव ने पार्वती को स्वीकार कर गृहस्थ जीवन अपनाया। यह विवाह केवल सामाजिक या पारंपरिक नहीं था, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन और शक्ति की स्थापना का प्रतीक भी था. उनके पुत्र कार्तिकेय ने राक्षस तारकासुर का नाश कर ब्रह्मांड की व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया.महाशिवरात्रि पर दीपों की रोशनी और मंत्रोच्चार हमें यह सिखाते हैं कि दिव्य मिलन केवल इच्छा से नहीं, बल्कि आंतरिक विकास और तपस्या से प्राप्त होता है.

महाशिवरात्रि का संदेश
इस रात का वास्तविक महत्व यही है कि भक्त पहले स्वयं को शुद्ध करें, अपने अहंकार और इच्छाओं को परास्त करें और तभी शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का अनुभव कर सकें. यह दिन चेतना, भक्ति और आंतरिक शक्ति के जागरण का प्रतीक है.

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