गुमनाम बटोही की कहानी...
"हम बैठे रहे तट पर, उम्र भर अपनी ख़ुद्दारी की आँखों से किनारे देखती हुई; जाने कितने नाविक आये, अपनी-अपनी चाहतों के साथ, पर कोई पार न उतरा, कोई हमारी उम्मीदों को न छू सका; रेत में बिखरी हुई आँखों के आँसू, समय से पहले बूढ़ी हुई इच्छाओं की लंबी परछाइयाँ, और उन अनकहे किस्सों की गुमनामी-सब कुछ हमारे भीतर ही रह गया, बस प्रतीक्षा के स्वर बचे हैं, और पल भर भी वीणा के तार नहीं उतरे।
तट पर बैठे रहे उम्र भर
लेकिन हम शर्तों पर पार नहीं उतरे !
जाने कितने नाविक आये
हर नाविक की अपनी चाहें
चाहा, फिर भी झुका न पाये
हम अपनी ख़ुद्दार निगाहें
रेत भरी आँखों में अक्सर
पर अनुनय के आँसू चार नहीं उतरे !
हुयीं समय से पहले बूढ़ी
सारी अनब्याही इच्छाएं
हथेलियाँ तरसीं हल्दी को
व्यापारी यह समझ न पायें
आँखें तक रख दीं राहों पर
पर घोड़े से राजकुमार नहीं उतरे !
आखिर किसको दोषी कह दें
खुद को या फिर किस्मत को ही
हम ने खुद ही लुटते देखे
हैं, कितने गुमनाम बटोही
हैं बस शेष प्रतीक्षा के स्वर
पल भर भी वीणा के तार नहीं उतरे !


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