एक ऐसे भगवान, जो एक शृंगार दोबारा नहीं धारण करते—पर शरणागत भक्त को कभी नहीं छोड़ते
श्री वृन्दावन धाम में विराजमान श्री राधारमण जी का स्वरूप जितना अनुपम है, उतनी ही गहन है उनकी कृपा। दिन में अनेक बार उनकी पोशाक बदली जाती है—मंगला आरती से लेकर शयन आरती तक, हर सेवा में एक नया रंग, एक नई छवि, एक नया सौंदर्य। पर इन बदलती पोशाकों के बीच जो कभी नहीं बदलता, वह है —भक्तों के प्रति उनका प्रेम और उनकी कृपा।
श्री राधारमण जू की पोशाक केवल वस्त्र नहीं, वह सेवा का उत्सव है। हर रंग, हर आभूषण, हर शैली किसी न किसी भाव को प्रकट करती है। भक्तों के हाथों सजी यह पोशाकें बताती है कि प्रभु हर भाव को स्वीकार करते हैं। जैसे-जैसे पोशाक बदलती है, वैसे-वैसे भक्तों का हृदय और अधिक आकर्षित होता है, और वह यह समझ पाता है कि ठाकुर जी कितने कृपामयी हैं जो त्रिलोकी के स्वामी होने के बाद भी भक्तों द्वारा दी गई छोटी सी सेवा को स्वीकार करते हैं।
पर इस निरंतर परिवर्तन के बीच एक शाश्वत सत्य है—श्री राधारमण जू अपने भक्तों को कभी नहीं बदलते। जो एक बार उनके शरणागत हो गया, वह सदा के लिए उनका हो जाता है। संसार में जहाँ संबंध शर्तों पर टिके होते हैं, वहीं राधारमण जू का संबंध केवल भाव पर टिका है। यहाँ योग्यता नहीं देखी जाती, यहाँ केवल समर्पण देखा जाता है।
भक्त का भाव चाहे अपरिपक्व हो, टूटा हुआ हो, या मौन में डूबा हो—श्री राधारमण जू उसे उसी रूप में स्वीकार करते हैं। वे भक्त की कमजोरी को कारण नहीं बनाते, बल्कि उसे अपनी शरण का अधिकारी बना देते हैं। यही कारण है कि वृन्दावन की गलियों में यह विश्वास सांस लेता है कि “श्री राधारमण जू किसी को छोड़ते नहीं।”
पोशाक बदलना लीला है, पर शरण देना स्वभाव। रंग बदलना सेवा है, पर भक्त को थामे रखना करुणा। श्री राधारमण जू सिखाते हैं कि बाह्य रूप परिवर्तनशील हो सकता है, पर प्रेम की जड़ें अडिग रहती हैं। जो उनके चरणों में भाव रख देता है, वह सदा के लिए सुरक्षित हो जाता है—उनकी छाया में, उनकी कृपा में, उनकी शरण में।
इसीलिए कहा जाता है— राधारमण जू की पोशाकें बदलती रहती हैं,
पर जिनका हाथ उन्होंने थाम लिया,
उन्हें वे कभी नहीं छोड़ते।


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