रजत पुलिन

पूर्णिमा की रात्रि , नदी का किनारा और चंचल हवाएं हर किसी को बहुत ही अधिक प्रिय होती है .क्योंकि जो शुकून प्रकृति के करीब जाकर मिलता है वो शुकून कहीं और नहीं मिलता .और जब पूर्णिमा की रात्रि हो और नदी का किनारा हो तो अपने आप ही मन में कविताएँ अंकुरित होने लगती है और प्राकृत की खूबसूरती को अपने शब्दों के मध्यम से बयां करने को व्याकुल हो उठते है .इसी प्रकृति की खुबसूरती को बयां करती मेरी कुछ पंक्तियाँ एक बार पढ़कर देखिये आप भी खुद को प्राकृत के बहुत ही करीब महसूस करेंगे ...
दिवसावसान के पश्चात ,
जब आई
पूर्णिमा की रात!
चांदनी रात को ,
निरवता लगा रही थी,
चार चांद!
लोल लहरें मंद स्वर
के साथ कर रहीं थीं!
नृत्य का अभ्यास!
निरवता को तोड़ते हुए,
जा रही थी जिसकी
दूर तक आवाज!
तमिस्त्रतोम को विभेदित
करती रेशमी विभा!
बढ़ा रही थी
राका निसि की सोभा!
व्योम मण्डल की
स्वाति-घटा को,
पेखि-पेखि हृदय तल में,
उत्पन्न हो रहा था अनुराग!
मंत्रमुग्ध कर रही थी,
यमुना की अविरल धार!
यमुना के निर्मल जल में,
शशि की मोहक छवि देख,
लबों पर आ रही थी मुस्कान!
देख पूर्णिमा का अद्भुत श्रृंगार, बार-बार
मन प्रफुल्लित हो रहा था बार-बार
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