जिंदगी कभी लगती है सर्द दोपहरी में, पलकों पे सुनहरी धूप सी, तो कभी लगती जेठ की तपती दोपहरी

जिंदगी में कई बार ऐसी परस्थितियाँ आ जाती है और इंसान की स्थिति ऐसी हो जाती है, कि वह जिन्दा तो होता है पर जिंदगी जी नहीं रहा होता है .एक तरह से वह जिन्दा लाश बन चुका होता है .उसे पता ही नही होता कि उसे वास्तव में हुआ क्या है ,कभी अचानक मरने की इच्छा होने लगती है, तो अचानक मरने का डर हद से ज्यादा सताने लगता है , वास्तव में ऐसे समय में इन्सान मन के भीतर चल रहें अंतर युद्ध से जूझ रहा होता है .उसकी दशा ऐसी हो चुकी होती है जिसे कुछ पाने की चाह ही नही रह जाती है ,जो सब कुछ अपना खो चूका होता है ,जिंदगी के ऐसे ही कई फीके रंगों को बयां कर रही है ये रचना .हमें उम्मीद है को आपको जरूर पसंद आयोगी
अचानक महसूस होता है
कि मैं क्यों हूँ ?
अचानक मरने की इच्छा,
अचानक मरने का डर!
अजीब-सी है मन में हलचल !
अचानक क्रोध,
अचानक हंसी का नाट्य,
कभी लगता, हूँ बिमार,
कभी अत्यंत कमजोर
तो कभी मजबूत चट्टान!
अजीब से हैं हालात!
कभी भीड़ में भी
तन्हाई का एहसास
और कभी अकेले में
भी हजारों के साथ!
सुख की निर्मम भोलेपन में
छिप जाती दुख की गठरी,
कभी जिंदगी पकड़ती रफ़्तार
तो कभी लगती ठहरी!
कभी जिंदगी सर्दी की
सुनहरी धूप-सी
तो कभी लगती
जेठ की तपती दोपहरी!
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