बालू खनन के गहरे गड्ढों ने निगले तीन मासूम, नियमों की अनदेखी पर उठे सवाल

सोनभद्र : प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध सोनभद्र जनपद एक बार फिर दर्दनाक हादसे का गवाह बना है। चोपन थाना क्षेत्र के मीतापुर गांव में सोन नदी में डूबने से तीन मासूमों की मौत और एक किशोर के लापता होने की घटना ने पूरे जिले को झकझोर दिया है। घटना के बाद ग्रामीणों, निषाद समाज और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश है। लोगों का आरोप है कि नदी में बालू खनन के दौरान बनाए गए गहरे गड्ढे इस त्रासदी की मुख्य वजह बने हैं।

जानकारी के अनुसार मांगलिक कार्यक्रम के बाद निषाद समुदाय के परिवार के लोग परंपरागत स्नान के लिए सोन नदी पहुंचे थे। इसी दौरान बच्चे नदी में बने गहरे गड्ढों की चपेट में आ गए। हादसे में 18 वर्षीय संदीप और 9 वर्षीय दीपक के शव बरामद कर लिए गए, जबकि 16 वर्षीय वीरभद्र उर्फ बोलबम की तलाश एसडीआरएफ की टीम द्वारा लगातार की जा रही है।
घटना के बाद मौके पर बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र हो गए। हालात की गंभीरता को देखते हुए चोपन, जुगैल और ओबरा थानों की पुलिस के साथ पीएसी भी तैनात की गई है। एडीएम वागीश शुक्ला, एएसपी अनिल कुमार और एसडीएम विवेक सिंह मौके पर पहुंचे तथा मृतकों के परिजनों को आपदा राहत कोष से चार-चार लाख रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की गई। हालांकि ग्रामीण और निषाद समाज के प्रतिनिधि 50 लाख रुपये मुआवजा एवं परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग पर अड़े हुए हैं।

खनन नियमों पर उठे गंभीर सवाल
घटना के बाद बालू खनन स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था और नियमों के पालन को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नदी में भारी मशीनों के जरिए गहरे गड्ढे बनाए गए, जिससे यह हादसा हुआ।
विशेषज्ञों के अनुसार बालू खनन के लिए निर्धारित नियमों में नदी की प्राकृतिक संरचना को सुरक्षित रखने, सीमित गहराई तक खनन करने तथा सुरक्षा संकेतक और चेतावनी बोर्ड लगाने का प्रावधान है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्थान पर हादसा हुआ वहां न तो कोई चेतावनी बोर्ड था और न ही किसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था। ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते खनन स्थलों का भौतिक सत्यापन और निगरानी की जाती तो इस प्रकार की दुर्घटना को रोका जा सकता था।
जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने भी मांग की है कि केवल अस्थायी रूप से खनन कार्य रोकना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय कर कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही जिले के सभी बालू घाटों की सुरक्षा एवं खनन मानकों की तत्काल समीक्षा की जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। मीतापुर की यह त्रासदी केवल एक हादसा नहीं, बल्कि नदी घाटों पर सुरक्षा प्रबंधन, खनन निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच के बाद जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है और पीड़ित परिवारों को न्याय कब मिलता है।

रिपोर्टर : कुम्धज चौधरी

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