बेटियां VIDEO CALL पर देखती रहीं पिता की चिता, पिता ने बेटी को ही मार डाला!

आज हम बात करेंगे...दो ऐसी खबरों की, जिनकी तस्वीरें अलग हैं...घटनाएं अलग हैं...जगह अलग है...लेकिन दोनों तस्वीरें हमारे समाज के उस चेहरे को सामने लाती हैं, जिसे देखकर शायद हम खुद से नजरें चुराना चाहें। जी हां एक तस्वीर में...एक पिता की जलती चिता है...और उस चिता को वीडियो कॉल पर देखती उसकी बेटियां। और दूसरी तस्वीर में...चंबल का पानी है...उसमें अपनी ही बेटी की लाश...और उसके पैरों को छूता हुआ एक पिता। एक पिता ने अपनी बेटियों को पढ़ाया... लिखाया...जिंदगी में आगे बढ़ाया...लेकिन जब उसे बेटियों की जरूरत थी, तो बेटियों ने वक्त न होने का हवाला दे दिया। और दूसरी तरफ...एक पिता ने अपनी 18 साल की बेटी की जिंदगी ही खत्म कर दी...सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे समाज की तथाकथित इज्जत का डर था। एक तरफ रिश्तों में संवेदनाएं मरती दिखाई दीं...तो दूसरी तरफ झूठी शान के नाम पर इंसानियत का कत्ल हो गया। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि इन दोनों घटनाओं में गलती किसकी थी...सवाल ये है कि आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं? आज की इस खास रिपोर्ट में हम बात करेंगे उन दो घटनाओं की...जो शायद एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं...लेकिन दोनों मिलकर हमारे समाज से एक ही सवाल पूछ रही हैं कि रिश्ते आखिर कितने बचे हैं...और इंसानियत आखिर कितनी बची है? देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट...

दरअसल, पिछले दो दिनों में दो तस्वीरें सामने आईं...पहली तस्वीर हरियाणा के सोनीपत से आई...जहां एक वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्ग की मौत के बाद उनकी बेटियों ने वीडियो कॉल के जरिए पिता का अंतिम संस्कार देखा। और दूसरी तस्वीर आगरा के चंबल इलाके से सामने आई...जहां एक पिता पर अपनी ही 18 साल की बेटी की हत्या का आरोप लगा...और हत्या के बाद वही पिता बेटी की लाश के पैर छूकर माफी मांगता नजर आया। दोनों घटनाओं के बीच कोई सीधा संबंध नहीं...लेकिन दोनों घटनाएं हमारे समाज के सामने एक बहुत बड़ा सवाल छोड़ गईं। सबसे पहले हम सोनीपत की कहानी से शुरू करते हैं...दरअसल, एक बुजुर्ग कपड़ा व्यापारी शिवचरण गुप्ता ने अपनी तीन बेटियों को बड़े प्यार से पाला-पोसा... पढ़ाया-लिखाया और अपने पैरों पर खड़ा किया। उनकी दो बेटियां शिक्षिका बनीं। यानी जिस पिता ने बेटियों को जिंदगी में आगे बढ़ाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी...

वही पिता जिंदगी के आखिरी पड़ाव में एक वृद्धाश्रम में पहुंच गया। बताया गया कि शिवचरण गुप्ता करीब डेढ़ साल से वृद्धाश्रम में रह रहे थे। आश्रम संचालक लगातार उनकी बेटियों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे। उन्हें बताया गया कि पिता की तबीयत खराब है...एक बार आकर देख लीजिए। लेकिन आरोप है कि बेटियों की तरफ से बार-बार समय न होने की बात कही गई। और फिर वह दिन आया...जब शिवचरण गुप्ता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। पिता की मौत के बाद भी बेटियां उनके पास नहीं पहुंचीं। एक बेटी ने नेपाल से ऑनलाइन 5100 रुपये भेजे और कहा कि अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर दीजिए। सोचिए...जिस पिता ने अपनी जिंदगी बेटियों के भविष्य के लिए लगा दी...उसकी अंतिम विदाई के लिए बेटियों ने पैसे भेज दिए...लेकिन खुद वहां नहीं पहुंचीं। पिता की चिता जली...और बेटियां मोबाइल की स्क्रीन पर वीडियो कॉल के जरिए अपने पिता का अंतिम संस्कार देखती रहीं।

यह तस्वीर सिर्फ एक पिता की मौत की तस्वीर नहीं है...यह सवाल है उन रिश्तों पर, जिन्हें हम दुनिया का सबसे मजबूत रिश्ता कहते हैं। और बात यहीं खत्म नहीं हुई। जब अस्थियों को लेकर पूछा गया तो बताया गया कि बेटियों के पास समय नहीं था। कहा गया कि अस्थियों का विसर्जन भी आप ही कर दीजिए...और वीडियो बनाकर भेज दीजिए। अब जरा खुद से पूछिए...क्या आधुनिक जिंदगी की व्यस्तता इतनी बड़ी हो गई है कि माता-पिता की आखिरी विदाई के लिए भी हमारे पास समय नहीं? क्या पैसे भेज देना...जिम्मेदारी पूरी कर देना है? क्या वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देख लेना...पिता के प्रति हमारा फर्ज पूरा कर देता है? और अगर ऐसा है...तो फिर उस पिता के जीवनभर के त्याग की कीमत क्या रह गई? लेकिन अभी हम इस सवाल का जवाब तलाश ही रहे थे...कि आगरा से एक ऐसी खबर सामने आई जिसने इंसानियत को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। जी हां यहां एक पिता पर अपनी 18 साल की बेटी की हत्या का आरोप लगा। बताया गया कि बेटी बिना शादी के गर्भवती हो गई थी। पिता अपनी बेटी को दवा दिलाने के बहाने आगरा के बासौनी इलाके में लेकर पहुंचा। बेटी को शायद अंदाजा भी नहीं था कि जिस पिता पर उसे सबसे ज्यादा भरोसा था...वही उसके लिए मौत का कारण बनने वाला है। आरोप है कि पिता ने अपने दामाद के साथ मिलकर बेटी को चंबल नदी में डुबो दिया। एक बेटी...जिसे कभी पिता ने गोद में खिलाया होगा...जिसका हाथ पकड़कर चलना सिखाया होगा...जिसके भविष्य के सपने देखे होंगे...उसी बेटी की जिंदगी समाज की इज्जत के नाम पर खत्म कर दी गई। 

लेकिन इस घटना का सबसे हैरान कर देने वाला पहलू इसके बाद सामने आया। बताया गया कि बेटी की हत्या के बाद पिता उसकी लाश के पैर छूकर माफी मांग रहा था और दामाद इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बना रहा था। सोचिए...जिसे मारने से पहले इज्जत का ख्याल इतना बड़ा था...उसी बेटी को मारने के बाद पिता के अंदर अपराध-बोध इतना जाग गया कि वह उसकी लाश के पैर छूकर माफी मांगने लगा। इनता ही नहीं इसके बाद दिल्ली लौटकर बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई। लेकिन पुलिस की जांच आगे बढ़ी...पूछताछ हुई... और फिर कथित तौर पर इस पूरे मामले का सच सामने आया। अब आप इन दोनों घटनाओं को एक साथ रखकर देखिए। एक तरफ एक पिता है...जिसने अपनी बेटियों को पढ़ाया-लिखाया...बड़ा किया...लेकिन आखिरी वक्त में उसकी बेटियां उसके पास नहीं पहुंचीं। दूसरी तरफ एक पिता है...जिसने समाज की कथित इज्जत के नाम पर अपनी बेटी की जिंदगी खत्म कर दी। एक तरफ रिश्तों में दूरी दिखाई दी...दूसरी तरफ रिश्तों पर मालिकाना हक की खतरनाक सोच दिखाई दी। देखा जाए तो भले ही दोनों घटनाओं का रास्ता अलग था...लेकिन मंजिल एक ही थी...रिश्तों का टूटना।

तो आखिर में सवाल हम सबके सामने है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? हमें तय करना होगा कि हमें कैसा समाज चाहिए...ऐसा समाज जहां मां-बाप की अंतिम विदाई वीडियो कॉल पर हो...या ऐसा समाज जहां आखिरी वक्त में बच्चे अपने माता-पिता के सिरहाने खड़े हों। क्योंकि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते...रिश्ते वक्त देने से बनते हैं...साथ निभाने से बनते हैं...
और सबसे ज्यादा...इंसानियत से बनते हैं। सोनीपत के शिवचरण गुप्ता की जलती चिता हो...या चंबल में बहती उस बेटी की लाश...दोनों तस्वीरें हमसे सिर्फ एक सवाल पूछ रही हैं...क्या हम सच में आधुनिक हो गए हैं...या सिर्फ हमारी तकनीक आधुनिक हुई है, हमारी सोच और संवेदनाएं अब भी वहीं खड़ी हैं? फिलहाल इस खास रिपोर्ट में इतना ही...

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.