समाजवादी पार्टी का बड़ा दांव, तीसरा उम्मीदवार न उतारकर किन आंतरिक खतरों से बचे अखिलेश यादव?
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के द्विवार्षिक चुनावों में इस बार मुकाबला बेहद रोमांचक होने की उम्मीद थी, लेकिन नामांकन के अंतिम दौर में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। बीजेपी ने जहां 8 उम्मीदवार उतारे हैं, वहीं समाजवादी पार्टी ने केवल 2 उम्मीदवार ही खड़े किए हैं। इसके चलते अब बिना किसी बड़े मुकाबले के सभी 10 सीटों पर चुनाव निर्विरोध निपटने के रास्ते पर हैं। पहले यह चर्चा जोरों पर थी कि सपा तीसरा उम्मीदवार भी मैदान में उतार सकती है, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने जमीनी हकीकत का व्यावहारिक आकलन करते हुए इससे पीछे हटना ही मुनासिब समझा।
इस रणनीतिक फैसले के पीछे मुख्य वजह फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनावों का वह कड़वा अनुभव रहा है, जब क्रॉस-वोटिंग के कारण सपा को भारी झटका लगा था। वर्तमान राजनीतिक गणित और पार्टी के कई विधायकों (जैसे पूजा पाल, राकेश पांडे, विनोद चतुर्वेदी और आशुतोष मौर्य) के एनडीए की तरफ संभावित झुकाव को भांपते हुए अखिलेश यादव ने तीसरा उम्मीदवार उतारने का जोखिम नहीं उठाया। यदि पार्टी तीसरा प्रत्याशी उतारती और क्रॉस-वोटिंग के चलते हार का सामना करना पड़ता, तो इसका सीधा असर पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल और साल 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों पर पड़ता।
राज्यसभा चुनाव की प्रणाली को समझें तो वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा में 396 विधायक हैं और एक सीट जीतने के लिए 37 प्रथम-वरीयता वोटों की जरूरत होती है। सपा और कांग्रेस गठबंधन के पास कुल 103 विधायक हैं, जिनमें से कुछ विधायकों के पाला बदलने की पूरी आशंका थी। अतिरिक्त सीट के लिए अनिश्चित और जोखिम भरी लड़ाई में उलझने के बजाय संगठनात्मक स्थिरता को चुनकर सपा ने यह संदेश दिया है कि पार्टी फिलहाल अपनी आंतरिक एकजुटता को बचाने और 2027 के मुख्य रण पर फोकस करने के मूड में है। इस प्रकार, राज्यसभा के इस अंकगणित ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि यूपी की राजनीति में दूर की कौड़ी सोचकर ही कदम बढ़ाए जाते हैं।

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