श्रीपति मिश्रा: जज से सुल्तानपुर प्रधान, फिर यूपी का मुख्यमंत्री

1990 के दशक की शुरुआत से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव की बयार चल पड़ी थी। कांग्रेस का जनाधार कम होता गया और ब्राह्मण नेताओं की बढ़ती संख्या ने कांग्रेस की मजबूती को चुनौती दी। उसी समय एक जज से मुख्यमंत्री बने नेता ने अपनी सादगी और संघर्ष से सबका ध्यान खींचा—यह कहानी है श्रीपति मिश्रा की।

श्रीपति मिश्रा का जन्म 20 जनवरी 1924 को सुल्तानपुर ज़िले के शेषपुर गाँव में हुआ। उन्होंने बीएचयू से एम.ए. और लखनऊ यूनिवर्सिटी से एल.एल.बी. की डिग्री ली। छात्र राजनीति में सक्रिय रहे मिस्‍त्रा ने 1954 में फर्रुखाबाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट की नौकरी शुरू की, लेकिन 1958 में इस्तीफा देकर राजनीति का रास्ता चुन लिया।

उनकी राजनीति गांव से शुरू हुई—वे ग्राम प्रधान चुने गए और बाद में सुल्तानपुर से विधायक भी बने। 1980 में विधान सभा स्पीकर बने और वी.पी. सिंह के इस्तीफे के बाद 19 जुलाई 1982 को यूपी के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 2 अगस्त 1984 तक रहा, और बाद में वे लोकसभा निर्वाचित हुए. फिल्मी कहानी जैसा यह सफर बताता है कि जज की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरना कितना बड़ा फैसला था—जो उनके लिए सही साबित हुआ 

राजनीति के उच्च मंच तक पहुंचने के बावजूद उनके संबंध राजीव गांधी और अरुण नेहरू के साथ बिगड़ गए, और 1984 में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। 7 दिसंबर 2002 को लखनऊ में लंबे संघर्ष के बाद उनका निधन हो गया 
श्रीपति मिश्रा की कहानी सिखाती है कि जो दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास रखते हैं, वे चुनौतीपूर्ण निर्णय लेकर भी उच्चता प्राप्त कर सकते हैं।

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