बूढ़ा बाघ और लालची आदमी

लघु कथा :

एक घने जंगल में एक बूढ़ा बाघ रहता था। उम्र बढ़ने के साथ उसकी ताकत कम हो गई थी। अब वह पहले की तरह शिकार नहीं कर पाता था। कई दिन तक उसे भोजन नहीं मिलता।

एक दिन उसे नदी के किनारे एक सुनहरा कंगन मिला। उसने सोचा कि यह उसके लिए शिकार पकड़ने का अच्छा साधन हो सकता है।

बाघ नदी के किनारे बैठ गया और राहगीरों से कहने लगा—

“भाइयो! मैं बूढ़ा हो चुका हूं। मैंने हिंसा छोड़ दी है। मेरे पास यह सोने का कंगन है। जिसे जरूरत हो, वह इसे ले जाए। मैं अब किसी का बुरा नहीं चाहता।”

कुछ लोग उसकी बात सुनकर दूर से ही निकल जाते। उन्हें पता था कि बाघ पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है।

लेकिन एक गरीब यात्री वहां से गुजरा। बाघ ने उसे देखकर कहा, “भाई, तुम बहुत परेशान लगते हो। यह सोने का कंगन तुम्हारी गरीबी दूर कर सकता है। मैं तुम्हें यह दान में देना चाहता हूं।”

यात्री के मन में लालच पैदा हो गया।

उसने सोचा, “अगर मुझे यह कंगन मिल जाए तो मेरी जिंदगी बदल जाएगी।”

लेकिन नदी और बाघ के बीच कीचड़ भरा रास्ता था। यात्री हिचकिचाया।

बाघ बोला, “डरो मत। मैं बूढ़ा हूं। मैंने हिंसा छोड़ दी है। तुम मेरे पास आ जाओ।”

यात्री धीरे-धीरे कीचड़ में उतर गया। कुछ दूर जाने के बाद उसके पैर दलदल में फंस गए।

वह मदद के लिए चिल्लाने लगा।

बाघ उसकी ओर बढ़ा और बोला, “घबराओ मत, मैं तुम्हें बाहर निकालता हूं।”

यात्री को अब अपनी गलती समझ आ गई थी। उसने सोने के कंगन के लालच में अपनी बुद्धि खो दी थी।

बाघ ने उसे अपना शिकार बना लिया।

सीख

लालच जब विवेक पर हावी हो जाता है, तो इंसान खतरे के संकेत देखकर भी आगे बढ़ता रहता है।समझदार व्यक्ति केवल यह नहीं देखता कि उसे क्या मिल रहा है, बल्कि यह भी सोचता है कि सामने वाला उसे इतना बड़ा लाभ क्यों देना चाहता है।

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.